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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*दादू शब्द विचार करि, लागि रहे मन लाइ ।*
*ज्ञान गहै गुरुदेव का, दादू सहज समाइ ॥२३॥*
इस पद्य में श्रीदादूजी महाराज ज्ञानाभ्यास, बोधाभ्यास तथा ब्रह्माभ्यास बतला रहे हैं । जिनके लक्षण ये हैं-
उस आत्मा का ही चिन्तन, उसका ही कथन, उसका ही परस्पर प्रबोधन तथा उसके ही परायण रहना- इसी को ‘ज्ञानाभ्यास’ कहते हैं ।
यह जगत् सृष्टि के आदि में कभी भी पैदा नहीं हुआ, तथा यह जगत् और मैं भी कभी नहीं हूँ- ऐसा विचार ही ‘बोधाभ्यास’ कहलाता है ।
यह दृश्य कभी हुआ ही नहीं- इस ज्ञान से राग-द्वेषादि की कमी होने से परमात्मा में अत्यधिक प्रेम पैदा होता है- यह ही ‘ब्रह्माभ्यास’ कहलाता है ।
ज्ञाता एवं ज्ञेय की मिथ्यात्वबुद्धि ही ‘अभाव सम्पत्ति’ है । स्वरूप से ही ब्रह्म के अतिरिक्त ज्ञाता ज्ञेय की प्रतीति न होना ही ‘अत्यन्ताभावसम्पत्ति’ कहलाती है । इन तीनों के अभ्यास से सहज में ही ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है ॥२३॥
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*दया विनती*
*दादू कहै सतगुरु शब्द सुनाइ करि, भावै जीव जगाइ ।*
*भावै अन्तरि आप कहि, अपने अंग लगाइ ॥२४॥*
हे सद्गुरो ! अविद्या निद्रा में सोये हुए प्राणियों को ज्ञान वैराग्य बोधक वाक्य सुनाकर उनकी अविद्या को दूर कीजिये । अथवा- आप स्वयं उनके हृदय में प्रकट होकर अपनी कृपा से माया को दूर करके स्वस्वरूप में लीन कीजिये ॥२४॥
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*सतगुरु शब्द बाण*
*दादू बाहरि सारा देखिये, भीतरि किया चूर ।*
*सतगुरु शब्दों मारिया, जाण न पावै दूर ॥२५॥*
साधक की शरीर निर्वाह आदि क्रिया तो सर्वसाधारण जन के समान होती है; परन्तु उसके आन्तरिक काम-क्रोधादि विकारों को सद्गुरु ज्ञानवैराग्यादि बोधक वाक्यसमूह से नष्ट करके उस को ब्रह्मनिष्ठ कर देते हैं । मेरे भी गुरुकृपा से कामादि विकार नष्ट हो गये, अतः मैं सर्वदा स्वस्वरूप का अनुभव करता हूँ । अब मेरा मन परमात्मा से दूर(बाहर) नहीं जाता ॥२५॥
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*दादू सतगुरु मारे शब्द सौं, निरखि निरखि निज ठौर ।*
*राम अकेला रह गया, चित्त न आवै और ॥२६॥*
सद्गुरु ने ब्रह्मप्राप्ति में बाधक काम-क्रोधादि मानसिक विकारों को दया क्षमा सन्तोषादि प्रबोधक वाक्यबाणों से मार कर मेरे मन को शुद्ध कर दिया । अतः अब मेरे मन में वासना के अभाव से राम चिन्तन के अतिरिक्त अन्य चिन्तन नहीं होता ॥२६॥
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*दादू हमको सुख भया, साध शब्द गुरु ज्ञान ।*
*सुधि बुधि सोधी समझकर, पाया पद निर्वाण ॥२७॥*
गुरुओं के ज्ञानबोधक शब्द समूह को सुन-सुनकर मेरे मन में आत्यन्तिक सुख प्राप्त हुआ । अब मेरी बुद्धि शुद्ध हो गयी । उस शुद्धबुद्धि में आत्मा के स्वरूप का विचार करके मैंने ब्रह्म पद भी पा लिया ॥२७॥
(क्रमशः)

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