मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

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*दादू मेरे हृदय हरि बसै, दूजा नांही और ।*
*कहो कहाँ धौं राखिये, नहीं आन को ठौर ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग ३* *अर्चना भक्ति*
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भगवत् पूजा में मुख्य हेतु भाव ही है । अवस्था वस्तुएं और आचारादि सब गौण हैं । देखो ! चन्द्रहास की अवस्था बालक थी । पूजा के उपचार उन्हें प्राप्त नहीं थे और आचार की तो बात कहां थी । वे अपने शालग्राम की मूर्ति मुख में रखते थे । तो भी उनका भाव परम शुद्ध और महान होने से भगवान ने उन पर महान कृपा की थी । चन्द्रहास भक्त की कथा प्रसिद्ध है ।
अर्चन में इक भाव ही, मुख्य कुछ नांहि ।
चन्द्रहास हरिमूर्ति को, रखते मुख के माँहि ॥१३२॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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