🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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६८ - निज घर परिचय । पँचम ताल
भाई रे, घर ही में घर पाया ।
सहज समाइ रह्यो ता माँहीं,
सतगुरु खोज बताया ॥टेक॥
ता घर काज सबै फिर आया,
आपै आप लखाया ।
खोल कपाट महल के दीन्हें,
थिर सुस्थान दिखाया ॥१॥
भय औ१ भेद, भरम सब भागा,
साच सोइ मन लाया ।
पिंड परै जहां जिव जावै,
ता में सहज समाया ॥२॥
निश्चल सदा चलै नहिं कबहूं,
देख्या सब में सोई ।
ताही सौं मेरा मन लागा,
और न दूजा कोई ॥३॥
आदि अनन्त सोइ घर पाया,
अब मन अनत२ न जाई ।
दादू एक रंगै रंग लागा,
ता में रह्या समाई ॥४॥
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ब्रह्म रूप परमधाम का परिचय दे रहे हैं - हे भाई ! सद्गुरु जनों ने विचार द्वारा खोज करके बताया है, वह विश्व का निवास स्थान परब्रह्म रूप घर हमने शरीर रूप घर में ही प्राप्त किया है और सहजावस्था द्वारा उसी में समाये रहते हैं ।
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उस परब्रह्म घर के लिये प्रथम हम अनेक स्थानों में तथा साधनों में फिर आये था किन्तु अन्त में वह अपने आत्म - स्वरूप का विचार करने पर दिखाई दिया है । जब विचार ने हृदय - महल के अज्ञान रूप कपाट खोल दिये तब अचल ब्रह्म रूप स्थान दिखाई दिया है ।
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अब तो भय और१ भेद जन्य सारा भ्रम बुद्धि से भाग गया है और जो सत्य ब्रह्म है, उसी में मन लगा है । शरीर का राग गिरने पर मुक्तात्मा जहां जाता है वो शरीराध्यास दूर होने पर जीवात्मा जहां जाता है, उसी सहज स्वरूप ब्रह्म चिन्तन में मन समाया रहता है ।
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जो सदा निश्चल रहता है, कभी भी चलायमान नहीं होता, उसी ब्रह्म को हमने सबमें देखा है और सभी अवस्थाओं में हमारा मन उसी में लगा रहता है । मन में अन्य वस्तु - चिन्तन वो दूसरा कोई भी विचार नहीं आता ।
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सँसार का आदि और अनन्त जो ब्रह्म रूप घर है, वही हमने पा लिया है । अब मन अन्यत्र२ नहीं जाता । एक अद्वैत ब्रह्म रँग के समीप आत्मा रूप रँग लगकर अद्वैत भाव से उसी में समा गया है ।
(क्रमशः)

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