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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= फुटकर काव्य २.गूढार्थ - १३/१४ =*
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*रामार्पण सब करत हैं कृष्णार्पण नहिं कोइ ।*
*कृष्णार्पण कृष्ण हिं मिलै रामार्पण घर षोइ ॥१३॥*
लोक में रामा – स्त्री के प्रेम(= विषयवासना) के लिये सब द्रव्य संग्रह करते हैं, भगवदर्पण के लिये कोई नहीं करता । जबकि कृष्णार्पण करने से भगवत्प्राप्ति का स्थायी सुख मिलता है, रामार्पण से तो इसके विपरीत वह घर सर्वथा विनष्ट हो जाता है ॥१३॥
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*रामा षाइ रवि पुत्र की तर जो ह्वै पर नारि ।*
*दास रहै सो दुःख मैं तीनौं उलटि बिचारि ॥१४॥*
मृत्यु की मार खाकर जो पर नारी में रत(आसक्त) होता है वह सदा दुःख में डूबा रहता है । यह अर्थ ‘रमा’, ‘तर’ एवं ‘दास’ शब्दों के अक्षर वैपरीत्य से निकलता है –ऐसा समझना चाहिये ॥१४॥
(रमा का ‘मार’, ‘तर’ का ‘रत’, एवं दास का ‘सदा’ कर देने से ।)
(क्रमशः)

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