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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*प्रेम भक्ति जब ऊपजै, पंगुल ज्ञान विचार ।*
*दादू हरि रस पाइये, छूटै सकल विकार ॥*
*दादू बंझ बियाई आत्मा, उपज्या आनन्द भाव ।*
*सहज शील संतोष सत, प्रेम मगन मन राव ॥*
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साभार ~ oshostsang.wordpress.com
समाधि जैसी महानतम घटना अकारण कैसे घटित होती है? अस्तित्व में कुछ भी अकारण घटित नहीं होता - ये सत्य है, लेकिन अस्तित्व स्वयं अकारण है। परमात्मा अकारण है और समाधि अर्थात् परमात्मा ! समाधि अर्थात् अस्तित्व ! और सब घटित होता है, परमात्मा घटित नहीं होता। परमात्मा है, ऐसा कोई क्षण नहीं जब नहीं होगा; ऐसा कोई क्षण नहीं था, जब नहीं था। और सब घटित होता है - मनुष्य, वृक्ष, पशु-पक्षी-सब घटित होते हैं।
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समाधि घटना नहीं है, समाधि मनुष्य का स्वभाव है; इसीलिये अकारण ही घट सकती है। महानतम घटना है समाधि - इसलिए अकारण ही घटित होती है। क्षुद्र सभी सकारण ही घटित होते हैं। समाधि भी यदि सकारण घटित होती तो वह भी क्षुद्र और साधारण ही हो जाती।
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जल को सौ डिग्री तक गर्म करो, भाप बन जाता है - ऐसे ही यदि समाधि भी होती तो सौ डिग्री तक तपस्या करो और समाधि घटित हो जाती और तब समाधि विज्ञान की प्रयोगशाला में पकड़ ली जाती। फिर धर्म के बचे रहने का कोई उपाय न रहता। क्योंकि सकारण घटित होने वाला सभी कुछ विज्ञान के दायरे में आ जाता है, जिसका कारण है,वह विज्ञान की सीमा में आ जाएगा। समाधि अकारण है। इसीलिये धर्म, सदैव धर्म ही रहेगा। विज्ञान कभी भी धर्म को सीमा में न घेर सकेगा। क्योंकि सकारण घटित होने वाला सब धीरे-२ विज्ञान की सीमा में आ जाता है।
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ये जो मनुष्य सोचता है कि परमात्मा को खोजना है, ये मनुष्य का तीन-पांच है।
परमात्मा मिला ही हुआ है, कुर्सियां तो चार ही हैं। जब भी गणित ठीक हो जाएगा, मनुष्य कहेगा, अहो ! पहले पांच कुर्सियां थी, अब चार हो गईं; ऐसा कहेगा क्या मनुष्य? नहीं, मनुष्य जान लेगा कि भूल हो रही थी, कुर्सियां चार ही थीं; मैंने पांच समझ ली थीं। भूल अस्तित्व में नहीँ, भूल स्मरण में है; भूल मनुष्य के गणित में है, भूल ज्ञान में है। इसीलिये सांख्य कहता है कि कुछ करने का प्रश्न ही नहीं है। पांच कुर्सियों को चार करने के लिए एक कुर्सी हटानी नहीं है। या मनुष्य ने यदि तीन समझ ली है, तो चार करने के लिए एक और बाहर से लानी नहीं है।
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कुर्सियां चार ही हैं। भूल केवल जोड़ की है। जोड़ ठीक हो जाने पर मनुष्य ये नहीं कहेगा कि अकारण कुर्सियां तीन से चार हो गईं या पांच से चार हो गईं। नहीं, मनुष्य तब हंसेगा कि होने का कोई प्रश्न नहीं है; कुर्सियां चार थी हीं। भूल मन की थी, अस्तित्व की भूल नहीं थी। कैसा आश्चर्य है कि मनुष्य ने जो सदैव है उसको न जान कर, अपने ही माया-मोह में भटक कर जो कभी था ही नहीं; उसे जान लिया।
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रस्सी में सांप देखा ! किरणों के जाल से मरूद्यान होने के भ्रम में उलझ गया ! जल देख लिया। जो नहीं था, वह देख लिया और जो था वह माया में; झूठे भ्रम में छिप गया और दिखाई नहीं पड़ा। समाधि कार्य-कारण के बाहर है। जिस क्षण मनुष्य अपना अहंकार छोड़ देगा - उसी क्षण घटित हो जायेगी। समाधि जप - तप पर निर्भर नहीं है।

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