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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)
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*एता कीजे, आप थैं, तन मन उनमन लाइ ।*
*पंच समाधी राखिये, दूजा सहज सुभाइ ॥८२॥*
साधक को पहले स्वस्तिक, पद्मासन आदि आसनों से शरीर की स्थिरता करनी चाहिये ।
हठयोग प्रदीपिका में लिखा है-
आसन से देह की स्थिरता, मन के चांचल्यरूप रजोगुण धर्म का नाश होने से मन की स्थिरता करनी चाहिये । रोग चित्तविक्षेप करने वाला है । पातंजल योगसूत्र में रोग को चित्तविक्षेपक माना है ।
सूत्र का अर्थ यह है-
#‘व्याधि’ धातुओं की विषमता के होने वाले ज्वरादि रोग ।
#‘स्त्यान’ अकर्मण्यता को कहते हैं । योग करना चाहिये या नहीं?
इस उभयकोटिक ज्ञान को ‘संशय’ कहते हैं ।
#समाधि के साधनों का अनुष्ठान करने में समर्थ होते हुए भी उनको न करना ‘प्रमाद’ कहलाता है अर्थात् विषयान्तर में लगने के कारण योग के साधनों में उदासीनता ।
#‘आलस्य’ तो प्रसिद्ध ही है ।
#चित्त के विषय विशेष में एकान्तिक अभिलाष को ‘अविरति’ कहते हैं । ‘भ्रान्तिदर्शन’ जो योग के साधन नहीं, उनमें योगसाधनत्व की भ्रान्ति एवं योग के साधनों में असाधनत्वबुद्धि ।
#समाधिभूमि और एकाग्रता का अलाभ ही ‘अलब्धभूमिकत्व’ कहलाता है अर्थात् चित्र का क्षिप्त एवं मूढविक्षिप्त रूप ही अलब्ध भूमिकत्व है ।
#‘अनवस्थितत्व’, समाधि-भूमि प्राप्त होने पर भी यत्न की शिथिलता के कारण चित्त का समाधि भूमि में न ठहरना ।
#अंगों की लघुता- अर्थात् गौरवरूप तम का नाश ही लघु है । अतीत और भविष्य का अनुसन्धान न करना एवं इष्ट-अनिष्ट अर्थ की प्राप्ति में समान रहना ही ‘उदासीनता’ है ।
पाँचों इन्द्रियों को समाहित रखना । ये सब कार्य साधक को पहले ही स्वयं कर लेने चाहिये । साधक शरीर निर्वाह(योगक्षेम) की चिन्ता न करें; क्योंकि वह तो प्रारब्ध कर्मानुसार होता ही रहता है ॥८२॥
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*दादू जीव जंजालों पड़ गया, उलझ्या नौ मण सूत ।*
*कोई इक सुलझे सावधान, गुरु बाइक अवधूत ॥८३॥*
यह जीवात्मा प्रपञ्चजाल में फँसा हुआ है और स्वयं इस जाल से निकल नहीं सकता; क्योंकि श्रुति में लिखा है-
“परमात्मा ने इन इन्द्रियों को बाह्य शब्दादि विषयों को ग्रहण करने वाली बना दिया, इसलिये ये बाह्य पदार्थों को ही विषय करती हैं । कोई विरला धैर्यशाली, जिसने अपने मन-इन्द्रियों को विषयों से लौटा कर अन्तर्मुख कर लिया है मोक्ष की इच्छा करता हुआ स्वस्वरूप को विज्ञानरूपी नेत्रों से देख लेता है । इसी अभिप्राय से श्रीदादूजी महाराज भी कहते हैं कि जैसे उलझे हुए नौ मन सूत को सुलझाना कठिन है उसी प्रकार मन को विषयों से हटाकर आत्मा में लगाना कठिन है । कोई अवधूत धीर पुरुष ही गुरुवचनानुसार चलता हुआ सावधानी से प्रपञ्च से बाहर निकल सकता है ।
अवधूत के लक्षणशास्त्र में यों बताये हैं- ‘अवधूत’ शब्द में चार अक्षर हैं- अ, व, धू और त । इन चारों के ही चार अर्थ ‘अवधूत’ नाम में आ जाते हैं । यथा-
#वह आशापाश से मुक्त, आदि से अन्त तक निर्मल तथा सदैव आनन्द में मग्न रहता है- यह ‘अवधूत’ के अकार का अर्थ है ।
#वासना जिसकी नष्ट हो गयी तथा निरामय वक्तव्य(निर्दोष वचन) बोलता है, वर्तमान में ही सदा लगा रहता है- यह वकार का अर्थ है ।
#शरीर जिसका धूल से सना हुआ है, परन्तु मन निर्मल है, तथा धारणा-ध्यान से भी जो मुक्त हो गया हो- यह धकार का अर्थ है ।
#अहंकार तथा चिन्ताचेष्टाओं से रहित हो कर सदा तत्त्व का ही चिन्तन करता है- यह तकार का अर्थ है ।
ऐसा अवधूत ही धैर्य से अपने मन को प्रपञ्चों से अलग कर सकता है । विकार की सामग्री के होते हुए भी जिसका मन विकृत नहीं होता, वही “धीर” कहलाता है ॥८३॥
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*मन निरोध का अंग*
*चंचल चहुँ दिसि जात है, गुरु बाइक सूँ बंधि ।*
*दादू संगति साध की, पारब्रह्म सौं संधि ॥८४॥*
श्रीदादूजी महाराज इस साखीवचन से मन के निग्रह का उपाय बतलाते हैं । यह मन चंचल है । अर्थात् सदा चलनस्वभाव वाला है । गीता में इस मन को चंचल स्वभाववाला, इन्द्रियों को मथने वाला, दृढ़ एवं बलवान् बतलाया है । फिर भी ज्ञान-वैराग्यबोधक गुरु वाक्यों से इस मन को जीता जा सकता है । इसे जीतकर साधु पुरुषों की संगति से परब्रह्म परमात्मा में लीन रखो, जिससे वह फिर से विक्षिप्त न होने पावे ॥८४॥
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*गुरु अंकुश मानैं नहीं, उदमद माता अंध ।*
*दादू मन चेतै नहीं, काल न देखे फंध ॥८५॥*
महाराज इस साखी से भी मन के स्वभाव का ही पुनः वर्णन कर रहे हैं । यह मन विषयों में अंधा हुआ, पागल की तरह दौड़ता है । बार-बार गुरु के समझाने पर भी उनके वाक्यों को भी नहीं सुनता । अधिक क्या कहें? यह इतना पागल हो गया है कि गले में फँसे हुए काल के फन्दे को भी नहीं देख पा रहा है ॥८५॥
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*दादू मार्यां बिन मानै नहीं, यहु मन हरि की आन ।*
*ज्ञान खड़ग गुरुदेव का, ता संगि सदा सुजान ॥८६॥*
इस उन्मत्त मन को गुरुज्ञानरूपी तलवार से ही मारा जा सकता है । मरा मन ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने योग्य हो जाता है । अन्यथा यह विहित कर्मों को त्यागकर निषिद्ध आचरण से शास्त्रमर्यादा का उल्लंघन कर के नरकगामी बन जाता है । लिखा है-
“इस प्रकार बराबर अभ्यास करने से यति का मन थोड़े ही समय में विषय के प्राप्त न होने से इन्धन रहित अग्नि की तरह शान्त होकर मुक्ति को प्राप्त कर लेता है” ॥८६॥
(क्रमशः)

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