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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= फुटकर काव्य २.गूढार्थ - ५/६ =*
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*त्यागी माया देवकी कियौ जसोमति हेत ।*
*पिवै अमी रस गोपिका कान्ह मिले करु षेत ॥५॥*
पञ्चम छन्द : (क) परमात्मा की माया(त्रिगुणात्मिका प्रकति) का त्यागकर तथा शुद्ध बुद्धि से प्रेमाभक्ति का वास्तविक रसास्वाद लिया जा सकता है । इसी बुद्धि(उपाय) से गोपियों ने भगवद् रस का पान किया था । कृष्ण का साक्षात्कार तो उनको बहुत समय(महाभारत युद्ध) के बाद कुरुक्षेत्र में हुआ था ॥
(ख) माया(वसुदेव की कन्या) देवकी तथा यशोदा का भेद त्याग कर ही भगवदाराधना धन में प्रवृत होना चाहिये । इसी बुद्धि के माध्यम से गोपियों ने भगवदाराधना की थीं । .......पूर्ववत् .......॥५॥
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*राम राम रटिवौ करहु रामा रमा निवारि ।*
*धर्म धाम मैं प्रगट है काम काम कौं मारि ॥६॥*
षष्ठ छन्द : रमा(लक्ष्मी) तथा रामा(नारी) का लोभ त्यागकर ही भगवद्भजन में प्रवृत्त होना चाहिये । इसी प्रकार, काम्य कर्मों का फल त्याग कर ही भगवद्भजन आरम्भ करना चाहिये, क्योंकि घट घट में चेतन की सत्ता अवभासित होती है ॥६॥
(क्रमशः)

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