मंगलवार, 15 अक्टूबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*एक देश हम देखिया, जहँ ऋतु नहीं पलटै कोइ ।*
*हम दादू उस देश के, जहँ सदा एक रस होइ ॥*
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दो शब्दों का भेद पहले समझ लेना होगा हमें, बुद्धि और बुद्धत्व। अज्ञानी के पास बुद्धि है, ज्ञानी के पास बुद्धत्व। बुद्धि का अर्थ होता है, विचार की क्षमता। और बुद्धत्व का अर्थ होता है, निर्विचार की क्षमता। *बुद्धि का अर्थ होता है, ऐसा आकाश जो बादलों से घिरा है। बुद्धत्व का अर्थ होता है, ऐसा आकाश जो अब बादलों से नहीं घिरा है। बुद्धि ही जब परम शुद्ध हो जाती है तो बुद्धत्व बन जाती है।*
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ऊर्जा वही है। बुद्धि ऐसी ऊर्जा है, जैसे सोना मिट्टी में पड़ा है धूलि धूसरित, कंकड पत्थर मिला। बुद्धत्व ऐसा सोना है जो आग से गुजर गया। कचरा कूडा जल गया, परिशुद्ध हुआ। चौबीस कैरेट। सोना जब परिशुद्ध हो जाता है तो बुद्धत्व। और सोना जब कंकड़ पत्थर, मिट्टी कचरे से मिला रहता है तो बुद्धि। बुद्धि को शुद्ध करते करते ही बुद्धत्व का जन्म होता है।
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इसको थोड़ा और सरल करने का प्रयास करते हैं।
बुद्धिपर्यन्तसंसारे मायामात्रं विवर्तते।
बुद्धिपर्यन्त संसार है। जहाँ तक बुद्धि हैं, वहाँ तक संसार हैं।
यह जो हमारे भीतर विचारों का जाल है, ताना बाना है, यही संसार है। धीरे धीरे विचार छूटते जाए, क्षीण होते जाए। तो एक समय ऐसा आएगा, हमारे भीतर ऐसे अंतराल आने लगेंगे, जब क्षण भर को कोई विचार न होगा। *एक विचार गया और दूसरा आया नहीं। कुछ समय के लिए खाली जगह छूट गई। उसी खाली जगह में से हमे अपना स्वम् का दर्शन होगा। उस अंतराल का नाम ही ध्यान की झलक है। वहां से हमे पहले स्वाद मिलने शुरू होंगे।*
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जैसे किसी ने द्वार खोला और सूरज दिखाई पड़ा। बहुत दूर है सूरज अभी। परन्तु द्वार खोलने से दिखाई पड़ता हैं। ऐसे ही एक विचार भी गिर जाये और थोड़ी सी खाली जगह आ जाये तो उसी खाली जगह में से अपने से संबंध जुड़ता हैं, क्षण भर को जुड़ता परन्तु वह क्षण भी शाश्वत हो जाता हैं। वह क्षण भी रूपांतरित कर जाता हैं। वह क्षण भी बडी गहरी कीमिया है।
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और याद रहे, जब तक बुद्धि है, विचारों से भरा हुआ जाल है हमारे भीतर, तब तक संसार है। और तब तक माया ही माया है। संसार बाहर नहीं है, बुद्धि की विचारणा में है। संसार ध्यान का अभाव है।
निर्ममो निरहंकारो निष्कामः शोभते बुधः॥
*वह जो बुद्धत्व को प्राप्त हो गया उसके भीतर कौनसी क्रांति घटती हैं? न तो उसके भीतर ममता रह जाती, न अहंकार रह जाता, न कामना रह जाती। विचार के जाते ही ये तीन विकार चले जाते हैं।* कामना चली जाती है। बिना विचार के कामना चल नहीं सकती। कामना को चलने के लिये विचार के अश्व चाहिए। विचार के घोडों पर बैठकर ही कामना चलती है। यदि हमारे भीतर विचार नहीं तो हम कामना को फेलायेंगे कैसे? किन घोड़ों पर सवार करेंगे कामना को? निर्विचार चित्त में तो कामना की तरंग उठ ही नहीं सकती। इसलिए कामना मर जाती है विचार के साथ। ममता मर जाती हैं। तब किसको कहेंगे मेरा? किसको कहेंगे अपना? किसको कहेंगे पराया? मेरा और तेरा विचार का ही संबंध है। जहां विचार नहीं वहां कोई मेरा नहीं, कोई तेरा नहीं। जहां विचार नहीं है वहां सब संबंध विसर्जित हो गये। सब संबंध विचार के हैं।
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और तीसरी वस्तु अहंकार हैं। जहां विचार नहीं वहां मैं भी नहीं बचता। क्योंकि मैं सभी विचारों के जोड़ का नाम है। सभी विचारों की इकट्ठी गठरी का नाम मैं।
ये तीन वस्तुए हट जाती हैं जैसे ही विचार हटता हैं। इस अवस्था के लिए प्रतिदिन कम से कम एक धंटा ध्यान का अभ्यास करना होगा। ध्यान का इतना ही अर्थ होता है, हम धीरे धीरे निर्विचार में रमने लगे। बैठे हैं, कुछ सोच नहीं रहे। चल रहे हैं और कुछ सोच नहीं रहे। सोच ठहरा हुआ है। इस ठहरेपन में ही हम अपने में डुबकी लगाएंगे। इस ठहरेपन में ही स्फुरणा होगी, समाधि जगेगी।

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