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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)
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*आत्मार्थी भेष*
*दादू मन माला तहँ फेरिये, जहँ दिवस न परसै रात ।*
*तहाँ गुरु बाना दिया, सहजैं जपिये तात ॥६६॥*
किसी ने श्रीदादूजी महाराज से पूछा- आप की माला कहाँ है? और आप उसको कहाँ बैठकर फेरते हैं? महाराज उसका उत्तर दे रहे हैं- *दादू मन माला* इस साखी वचन से इस उत्तर का भाव यह है कि मेरा मन ही माला है और उसकी वृत्ति ही उसके मणिये हैं । उन ब्रह्माकार वृत्तियों से निर्विकल्प समाधि में स्थित होकर मैं, जहाँ इडा, पिंगला आदि नाड़ी चक्र की भी गति नहीं होती उस सुषुम्ना में स्थित होकर, दिन-रात उस परमात्मा को अभेद्बुद्धि से जपता हूँ । उसके लिये बाह्यमाला तथा बाह्यवेष की आवश्यकता नहीं होती । लिखा है-
सुषुम्ना ही तीर्थ है । सुषुम्ना ही परम जाप है । सुषुम्ना ही ध्यान है । और सुषुम्ना ही परागति है ॥ जब पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ मन बुद्धि के सहित निश्चेष्ट हो जाती हैं वही परम गति मानी गयी है ।
अतः हे तात ! तुम भी ऐसा ही ध्यान करो । यह जप *अजपा जाप* कहलाता है । यही आत्मज्ञानी के लिये वेष है ॥६६॥
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*दादू मन माला तहँ फेरिये, जहँ प्रीतम बैठे पास ।*
*आगम गुरु थैं गम भया, पाया नूर निवास ॥६७॥*
मन की माला बना कर बाहर भीतर प्रत्यगात्मस्वरूप ज्योतिःस्वरूप जो शिव है वही मैं हूँ- इस आशयवाली वृति को परात्पर ब्रह्म में लगा कर ध्यान करे । यह सब गुरुकृपा से ही सम्भव है । इससे दुर्विग्राह्य ब्रह्म भी सुलभ हो जाता है । मैं भी गुरुकृपा से उस ब्रह्म को प्राप्त कर उस में ही निवास करता हूँ ॥६७॥
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*दादू मन माला तह फेरिये जहँ आपै एक अनन्त ।*
*सहजैं सो सतगुरु मिल्या, जुग-जुग फाग बसन्त ॥६८॥*
*दादू सतगुरु माला मन दिया, पवन सुरति सूँ पोइ ।*
*बिन हाथों निश दिन जपै, परम जाप यूँ होय ॥६९॥*
मन रूपी माला को निर्विकल्प अवस्था में सजातीय विजातीय स्वगत भेदशून्य अनन्त स्वस्वरूप ब्रह्म में स्थित कर ब्रह्म का ध्यान करो । मैंने गुरुकृपा से उस पद को प्राप्त कर लिया और दिन-रात ब्रह्मानन्द से खेलता हूँ ॥
मनमाला को श्वास-प्रश्वास रूप सूत्र से बांध कर ब्रह्माकार वृत्ति से अजपा जाप करो । यह जप सब जपों में श्रेष्ठ है ॥६८-६९॥
(क्रमशः)

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