बुधवार, 9 अक्टूबर 2019

= ६९ =


🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
.
६९ - मानस तीर्थ । पँचमताल
इत है नीर नहांवन जोग, 
अनतहि भ्रम भूला रे लोग ॥टेक॥
तिहिं तट न्हाये निर्मल होइ, 
वस्तु अगोचर लखै रे सोइ ॥१॥
सुघट घाट अरु तिरबो तीर, 
बैठे तहां जगत - गुरु पीर ॥२॥
दादू न जानै तिन का भेव, 
आप लखावै अंतर देव ॥३॥
.
६९ - ७० में मानव तीर्थ का परिचय दे रहे हैं - यहां मनुष्य शरीर में ही स्नान करने योग्य आत्मा नदी का सँयम रूप जल है । अन्य तीर्थों में तो लोग भ्रम से ही भटक रहे हैं । 
.
जब आत्मा नदी के सँयम - जल से स्नान करता है, तब ही प्राणी निर्मल होकर मन इन्द्रियों के अविषय ब्रह्म रूप सत्य वस्तु को देखता है । 
.
हृदय रूप सुन्दर घाट पर विचार - नौका का आश्रय ले सँयम तीर्थ को तैर कर उसके अगले तीर अर्थात् सँयम की पूर्णावस्था में जहां जगत् के सिद्ध - गुरु शुद्ध ब्रह्म विराजते हैं, वहां ही जाता है । 
.
उन शुद्ध ब्रह्म के स्वरूप रहस्य आदि, मध्य, अन्त को हम नहीं जानते । वे आन्तर स्थित ब्रह्म - देव जिन पर कृपा करते हैं, उनको ही अपना स्वरूप रहस्य बताते हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें