बुधवार, 9 अक्टूबर 2019

= *जीव ब्रह्म अंतराय निर्णय का अंग ८६(५/८)* =

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*दादू चौरासी लख जीव की, प्रकृति घट मांहि ।*
*अनेक जन्म दिन के करै, कोई जाणै नांहि ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
प्राण२ सु पेई१ लोह की, पति पारस ता माँहिं । 
रज्जब तन सुख सौं मढे, कंचन होत सु नाँहिं ॥५॥ 
लोह की पेटी में पारस रखा हो किन्तु पेटी१ वस्त्रादि से मढी हो तो पारस से सुवर्ण नहीं बन सकती, वैसे ही प्राणी२ में ब्रह्म है किन्तु प्राणी शरीर के सुख की आसक्ति से मढा है, इसी से ब्रह्म नहीं होता है । 
रज्जब राम बड़हु बड़ा, कोई न सारिख१ जोट२ । 
सो सुमेरु सांई छिप्या, तन तिणके की ओट ॥६॥ 
राम बड़ों से भी बड़ा है, उसके समान१ जोड़ी२ वाला अन्य कोई भी नहीं है । जैसे सुमेरु पर्वत बहुत बड़ा होने पर भी दृष्टि के आगे तृण लगा देने से छिप जाता है, वैसे ही देहाध्यास की ओट से अति विशाल ब्रह्म भी छिप रहा है । 
रज्जब चाकर पिंड के, चौरासी लख प्राण । 
सब आतम उलझी यहाँ, आगे लहै न जाण ॥७॥ 
चौरासी लाख योनियों के जीव सभी शरीर के सेवक बन रहे हैं, सभी जीवात्मायें शरीर की सेवा में फँस गई हैं, इसी से प्राणी प्रभु की ओर आगे जाने का साधन नहीं जान पाते । 
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित जीव ब्रह्म अंतराय निर्णय जीव ब्रह्म अंतराय निर्णय का अंग ८६ समाप्तः ॥सा. २७५१॥
(क्रमशः)

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