सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

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*दादू सांई कारण मांस का, लोही पानी होइ ।*
*सूखे आटा अस्थि का, दादू पावै सोइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ जीवित का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग ३* *विरह*
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संतवर दादूजी के शिष्य संत साधूजी अपनी बाल्यावस्था में हरि हरि विरह से इतने व्याकुल रहते थे कि उनका शरीर अति कृश हो गया था और उन्हे संसारिक कोई भी वस्तु अच्छी नहीं लगती थी । उनकी माता बारंबार वैद्यों को बुलाकर दिखाती थी किन्तु फल कुछ नहीं होता था । 
अन्त में दादूजी का शिष्य होने पर जब उन्हे हरि दर्शन हुआ तब ही उनकी वेदना शांत हुई थी । इसे ज्ञात होता है कि हरि विरही को हरि बिना कुछ भी कुछ भी अच्छा नहीं लगता ।
हरि विरही को कोउ भी, हरिविन रुचिकर नाँही ।
साधू तन सूखन लगा, बाल पने के भाँहि ॥३२९॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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