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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*दादू सतगुरु सहज में, किया बहु उपकार ।*
*निर्धन धनवंत करि लिया, गुरु मिलिया दातार ॥४॥*
*दादू सतगुरु सूं सहजैं मिल्या, लिया कंठ लगाइ ।*
*दया भई दयाल की, तब दीपक दिया जगाइ ॥५॥*
*दादू देखु दयाल की, गुरु दिखाई बाट ।*
*ताला कूंची लाइ कर, खोले सबै कपाट ॥६॥*
अपने मस्तक पर दुर्लभ हस्तकमल के स्पर्श से प्रसन्न अब अधोलिखित इन तीन साखी-वचनों से, भगवान् के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट कर रहे हैं-
दादू-सतगुरु सहज में किया बहुउपकार ।
..................................................॥५॥
ताला कूंची लाइ कर खोले सबै कपाट ॥६॥
अहो, तपश्चर्यादि साधनों के बिना ही सहज में ज्ञान देने वाले सद्गुरु ने मेरा बहुत उपकार किया है । मैं संसार में तृष्णा के वशीभूत हो दुःखों से घिरा इधर-उधर घूम रहा था, कहीं भी मुझे शान्ति-सुख नहीं मिल पा रहा था; ज्ञानदाता, महान् उदार गुरुदेव ने मेरी तृष्णा को नष्ट कर संतोष-धन से मुझे धनवान् बना दिया तथा मुझ पर ऐसी कृपा हुई कि जिससे मेरे हृदय में ज्ञान का दीपक प्रज्जवलित हो गया ।
उनकी दया के विषय में मैं क्या कहूँ? उनकी इस दया का प्रभाव तो देखो कि संसार में भटकते हुए को ज्ञान का मार्ग दिखाकर ज्ञान से कर्मबन्धन काट दिये, तथा हृदयमन्दिर में संशय एवं अज्ञानजन्य दोषों को और असम्भावना विपरीत भावनाजन्य दोषों को दुर्जर शृंखला से जुड़े हुए कपाटों की तरह नष्ट कर मेरे हृन्मंदिर को पवित्र कर दिया ॥४-६॥
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*सद्गुरु सामर्थ्य को अंग*
*दादू सतगुरु अंजन बाहिकर, नैन पटल सब खोले ।*
*हरे कानों सुणने लागे, गूंगे मुख सौं बोले ॥७॥*
हरि की तरह अकारणकरुणा-वरुणालय सद्गुरु द्वारा जब शिष्य को ज्ञान प्राप्त होता है तब वह शिष्य दिव्य ज्योति वाला बन जाता है । उस समय वह योगी की तरह व्यवहित, दूरस्थ, अतीत, अनागत पदार्थों को भी देखने लगता है । आचार्यों ने लिखा है कि ज्ञान होने पर ज्ञानी दर्पण में दीखने वाली नगरी की तरह अपने आत्मा में समग्र विश्व को देखने लगता है । जैसे हरि की कृपा से गूँगा बोलने लगता है, लँगडा पर्वत को भी लाँघ सकता है, उसी तरह गुरुकृपा से बहरे भी सुनने लगते हैं, गूँगे बोलने लगते हैं; क्योंकि गुरुदेव ज्ञानाञ्जन से शिष्य के नेत्रपटल खोल देते हैं ।
अथवा- जैसे कोई अज्ञानी हरि में प्रीति न होने से हरि के दर्शन नहीं करता, न उसकी यशोगाथा सुनता है; परन्तु उसी अज्ञानी पर यदि गुरु कृपा हो जाय तो वही कामादि दोष रहित हो कर प्रभु की गाथा तथा यश को सुनने लगता है एवं दर्शन करके प्रसन्न होता है । ऐसी अद्भुत गुरुकृपा होती है । लिखा है- “जो अज्ञान रूपी अन्धकार से अन्धे थे उनके नेत्रों में शलाका से जिसने ज्ञानरुपी अंजन डाल कर नेत्रों को खोल दिया, ऐसे गुरुदेव को हमारा बार बार नमस्कार है ॥७॥
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*सतगुरु दाता जीव का, श्रवण सीस कर नैन ।*
*तन मन सौंज संवारि सब, मुख रसना अरु बैन ॥८॥*
इस संसार में धर्म अर्थ काम मोक्ष के प्रदाता श्रीसद्गुरु ही महादानी कहलाते हैं । ऐसे सद्गुरु शिष्य के विषयों में प्रवृत्त ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों को प्रत्याहार द्वारा विषयों से हटाकर भगवत्परायण करते हैं ॥८॥
(क्रमशः)

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