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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= २७. राग धनाश्री - १३=*
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*आरती कैसैं करौं गुसांईं ।*
*तुमहीं व्यापि रहे सब ठांईं ॥(टेक)*
*तुमहीं कुंभ नीर तुम देवा*
*तुमही कहियत अलष अभेवा ॥१॥*
*तुमहीं दीपक धूप अनूपं,*
*तुमही घंटा नाद स्वरूपं ॥२॥*
*तुमहीं पाती पहुप प्रकासा,*
*तुमही ठाकुर तुमहि दासा ॥३॥*
*तुमहीं जल थल पावक पौंना,*
*सुंदर पकरि रहे मुष मौंना ॥४॥*
हे जगत्पति ! मैं आपकी पूजा कैसे करूँ; क्योंकि आप सर्वव्यापक हैं ॥टेक॥
हे देव ! आप ही कुम्भ(घट) हैं तथा आपही उसमें व्याप्त जल हैं । आप अलक्ष्य एवं अभेद्य हैं ॥१॥
आप ही दीपक हैं तथा अनुपम धूप हैं । तथा आपही पुजोपयोगी घण्टा तथा उसके नाद तुल्य(ध्वनि) हैं ॥२॥
आप ही प्रकाश करने वाले दीपक की बाती तथा उसका प्रकाश हो । आप ही वहाँ सेव्य एवं सेवक हैं ॥३॥
आप ही पृथ्वी, जल आदि पाँचों तत्त्व हैं ।अतः महात्मा सुन्दरदासजी हार(थक) कर आपकी, स्तुति के विषय में मौन रहना ही उचित समझते हैं ॥४॥
॥ श्री स्वामी सुन्दरदासविरचित पद भाग सम्पन्न ॥
॥ समस्त पद संख्या : २१३(दो सौ तेरह) ॥
॥ इति श्री स्वामी सुन्दरदास विरचित पद समाप्त सर्वपद संख्या २१३ ॥
(क्रमशः)

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