गुरुवार, 17 अक्टूबर 2019

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*दादू हौं बलिहारी सुरति की, सबकी करै सँभाल ।*
*कीड़ी कुंजर पलक में, करता है प्रतिपाल ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *ईश्वर* 
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(१) एक समय भगवान श्री कृष्ण से रुक्मिणीजी ने प्रश्न किया -आपका नाम विश्वम्भर है, क्या आप सबका भरण-पोषण करते हैं ? श्रीकृष्ण - हां, मैं सबको भोजन देता हूं ।
कुछ दिन के बाद रुक्मिणी ने एक चींटी को एक डिबिया में बन्द करके श्रीकृष्ण से पूछा आज आपने सबको भोजन दिया है । श्रीकृष्ण- हां, सबको दिया है और तुम जिसके लिये पूछना चाहती चाहती हो, उसे भी दे दिया है । रुक्मिणी ने चकित होकर डिबिया खोली तो देखा कि चींटी एक चावल के दाने को पकड़े बैठी है । डिबिया बंद करते समय भगवत् कृपा से रुक्मिणी के तिलक का चावल डिबिया में जा पड़ा था । सर्वज्ञ भगवान् से कोई भी बात छिपी रह नहीं सकती है ।

(२) पृथ्वीराज नामका एक व्यक्ति पत्थर की खानों का ठेकेदार था, एक दिन एक भारी पत्थर को तोड़ने पर पृथ्वीराज ने उसमें कीट देखा, उसके सामने कुछ सफेद शक्कर जैसा मधुर पदार्थ पड़ा था, यह देखकर पृथ्वीराज सचेत होकर विचार करने लगा - जब भगवान् पत्थर के भीतर, जहां वायु भी नहीं जा सकती, वहां भी भोजन भेज देते हैं, तब मैं पेट के लिये नाना अनर्थ क्यों करूँ ? ऐसा विचार करके वह सब कुछ त्याग करके ईश्वर -भजन ही करने लगा । उपर्युक्त दोनों कथाओं से ज्ञात होता है कि विश्वम्भर भगवान् सब को भोजन देता है ।
विश्वभर परमात्मा, सबको भोजन देत ।
रुक्मणी पृथ्वीराज का, संशय हरा सचेत ॥८०॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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