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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)
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*दादू मन फकीर मांही हुवा, भीतर लिया भेख ।*
*शब्द गहै गुरुदेव का, मांगै भीख अलेख ॥७०॥*
*दादू मन फकीर सतगुरु किया, कहि समझाया ज्ञान ।*
*निश्चल आसन बैस कर, अकल पुरुष का ध्यान ॥७१॥*
*दादू मन फकीर जग तैं रह्या, सतगुरु लीया लाइ ।*
*अहनिश लागा एक सौं, सहज शून्य रस खाइ ॥७२॥*
*दादू मन फकीर ऐसैं भया, सतगुरु के प्रसाद ।*
*जहाँ का था लागा तहाँ, छूटे वाद विवाद ॥७३॥*
*ना घर रह्या न वन गया, ना कुछ किया कलेश ।*
*दादू मन ही मन मिल्या, सतगुरु के उपदेश ॥७४॥*
इन सभी साखी पद्यों में श्रीदादूजी महाराज ने विवेक एवं वैराग्य का उपदेश किया है । जब साधक विवेकयुक्त मन से विचार करता है कि यह सांसारिक सुख क्या है, जिससे बार बार जन्मना मरना पड़ता है । ये समग्र चराचर की चेष्टा से होने वाले भाव भी अस्थिर ही हैं ।
वैभव भी आपत्ति का ही घर है । स्त्री-पुत्रादि वर्ग भी मनःकल्पित ही है । मन भी असत् ही है । असत् मन से ही हम मूढ बुद्धि वाले, वन में मृगतृष्णिका के द्वारा दूर से खींचे हुए मृग की तरह मोहगर्त में पड़े हुए बहुत समय से भगवान् को भूले हुए हैं ।
इस प्रकार गुरु के द्वारा सुनाये गये विवेक वैराग्यबोधक वाक्य समूह से मन में धारण कर, स्थिर आसन पर बैठकर निष्कल निरन्जन ब्रह्म का ध्यान करते हुए शून्यावस्था में ब्रह्म रस का अनुभव करे ॥
उसके लिये न वन में जाना है, न घर में रहने में अड़चन है, न तपश्चर्यादि साधन आवश्यक है, किन्तु गुरुकृपा से अनायास ही अपने मन में मननादि द्वारा ब्रह्मानन्द का अनुभव किया जा सकता है ॥७०-७४॥
(क्रमशः)

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