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*दादू आपा गर्ब गुमान तज, मत मत्सर अहंकार ।*
*गहै गरीबी बन्दगी, सेवा सिरजनहार ॥*
*मद मत्सर आपा नहीं, कैसा गर्व गुमान ।*
*सपनै ही समझै नहीं, दादू क्या अभिमान ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *सेवा*
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दादूपंथी साधुओं में नियम था कि जो पैसा रखेगा वह भगवा वस्त्र नहीं पहन सकता, श्वेत वस्त्र रखे । एक रामरूपजी मण्लेश्वर थे, वे साधु - सेवा में बड़ा प्रेम रखते थे । उनकी मण्डली के एक साधु को जुकाम लग गया । छोटा गांव था, दुकान भी एक ही थी ।
रामरूपजी ने स्वयं ही दुकान पर जाकर साधु के लिये काली मिर्च मांगी । दुकानदार ने पैसे मांगे । रामरूपजी ने कहा - "पैसे तो हम लोग नहीं रखते ।"
दुकानदार - "तो फिर मैं कालीमिर्च नहीं दुंगा ।"
इस पर रामरूपजी के मन में विचार उठा कि जो नियम साधु सेवा में बाधक है उसे मैं तोड़ डालूंगा । फाल्गुन शुक्ला पंचमी से एकादशी तक नरेना में दादूजी का मेला लगता है । उस समय विरक्त समुदाय में रामरूपजी ने कह दिया कि मैं आज से पैसा रखुंगा । इस पर सभी साधुओं ने निन्दा की किन्तु उन्होनें उसकी कोई परवाह न की पैसा रखने लग गये और प्रेम से साधु - सेवा करने लगे ।
वे बड़े संत थे । अन्त समय मे अजमेर में दलालों की बगेची में प्रात:काल दादूजी की कथा करते समय प्राण छोड़ कर ब्रह्मलीन हुए थे । इससे सूचित होता है कि साधु - सेवी साधु - सेवा में बाधक श्रेष्ठ नियम को भी छोड़ देते हैं ।
साधुसेवी निज नियम भी, तोड़त सेवा हेतु ।
रामरूप ने तोड़ कर, सेवा करी सचेत ॥३३१॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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