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*दादू चौड़े में आनन्द है, नाम धर्या रणजीत ।*
*साहिब अपना कर लिया, अन्तरगत की प्रीति ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ शूरातन का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *तप*
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भक्तवर नामदेव जी का नियम था कि एकादशी को अन्न न तो आप खाते थे और न किसी को देते थे । वृद्धावस्था आने पर इस नियम को छुड़ाने के लिये एकादशी के दिन ब्राह्मण के भेष में भगवान नामदेव जी के यहां गये और अन्न मांगा ।
नामदेव जी बोले - मैं आज अन्न नहीं दूंगा, कारण आज एकादशी है । ब्राह्मण बोला - मैं अन्न ही लूंगा, नहीं तो यहां ही मर जाऊंगा । नामदेव जी ने अन्न नहीं दिया । अन्त में ब्राह्मण मर गया । अपने हठ से ब्राह्मण की मृत्यु जानकर नामदेव जी ने ब्राह्मण का सिर अपनी गोद में रखकर जलने लगे, चिता प्रज्वलित हुई ।
तब ब्राह्मण बोला - यदि अब भी मुझे अन्न दो तो मैं जी उठूंगा ।
अबकी बार नामदेव जी पहचान गये और हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए बोले - भगवन यह क्या लीला कर रहे हो ?
भगवान् - बस अब वृद्ध हो गये हो, एकादशी छोड़ दो ।
भगवान आज्ञा तो मान्य ही थी, मान ली गई । देखो, नामदेवजी ने चिता में बैठकर जलने पर भी अपना नियम नहीं छोड़ा ।
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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