गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

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*जे चित्त चहुँटै राम सौं, सुमिरण मन लागै ।*
*दादू आत्मा जीव का, संसा सब भागै ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *नम्रता* 
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एक वैष्णव वृन्दावन जा रहा था, उसका नियम था कि - वैष्णव भक्त के ही ठहरे । उसे पता है कि अगले गांव में सभी वैष्णव हैं ।
इस गांव में पहुच कर एक गृहस्थ से कहा - मैं वैष्णव हूँ, सुना है कि इस गांव में सभी वैष्णव हैं । मैं एक रात को ठहरना चाहता हूँ।
गृहस्थ - महाराज मैं तो नीच हूँ अन्य सभी इस गांव मे वैष्णव है ।
इसी प्रकार गांव के सभी लोगों ने नम्रता पूर्वक कहा । किसी ने भी वैष्णवता का अभिमान नहीं किया । 
इस वैष्णव गांव की नम्रता देखकर पथिक वैष्णव की भांति दूर हो गई ओर अपने को भी सबसे नीच समझ कर एक वैष्णव के यहां ठहर गया ।
भक्तों में रह नम्रता, इसमें संशय नांहि ।
निज को सबने अधम कहा, एक ग्राम के मांहि ॥१५७॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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