गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

गुरुदेव का अंग ४१/४४

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*परापरी पासै रहै, कोइ न जाणै ताहि ।* 
*सतगुरु दिया दिखाइ करि, दादू रह्या ल्यौ लाइ ॥४१॥* 
परा अविद्या को कहते हैं उससे परे अर्थात् अविद्या तथा उसके कार्य-कारणों से पर जो परमात्मा आकाश की तरह सर्वव्यापक होने से उसकी सत्ता सर्वत्र है, फिर भी वह अज्ञानियों को नहीं दीखता । श्रुति में कहा है- 
“न उसका कोई कारण है न उसका कोई कार्य है, न उसके समान ही कोई दिखायी देता है, उससे बढ़कर दीखने की तो बात ही कहाँ है ।” 
“जिससे पर तथा अपर कुछ भी नहीं है, जिससे अधिक न कोई सूक्ष्म है न महान् ॥” 
“जो दिव्य, अमूर्त, बाह्याभ्यन्तर धर्म से रहित, अज पुरुष है । जो प्राण, मन से रहित शुभ्र अक्षर ब्रह्म से भी परे है ।” 
गीता में भी लिखा है- 
“वह चराचर प्राणियों के बाहर भी है, भीतर भी है, तथा अतिसूक्ष्म होने से अविज्ञेय है, तथा जो पास भी है और दूर भी है ।” 
इस प्रकार श्रुति-स्मृति से उसका परत्व सिद्ध हो जाता है । फिर भी उसको कोई नहीं जानता; क्योंकि श्रुति में लिखा है- 
“वह सम्पूर्ण संसार को जानता है, परन्तु उसको जानने वाला कोई नहीं । मेरे गुरु ने तो मुझको उसका तात्त्विक रूप दिखा दिया । अतः मेरा मन उसी में रमता है ॥४१॥ 
*शिष्य जिज्ञासा* 
*जिन हम सिरजे सो कहाँ, सतगुरु देहु दिखाइ ।* 
*दादू दिल अरवाह का, तहँ मालिक ल्यौ लाइ ॥४२॥* 
जिससे सारे प्राणी पैदा होते हैं, जिसके द्वारा जीते हैं, तथा प्रलय में जिसमें लीन हो जाते हैं, वही ब्रह्म है, उसको जानो । ‘जन्माद्ययस्य यत” - इस ब्रह्मसूत्र का भी यही अर्थ है । इस प्रकार श्रुति, ब्रह्मसूत्र, पुराणादि कों से सिद्ध परमात्मा कहाँ है? ऐसा प्रश्न करने पर महर्षि श्रीदादू जी ने कहा- दादू दिल अरवाह का । अर्थात् सभी प्राणियों के अन्तःकरणों में सर्वकार्य साक्षी परमात्मा विराजता है, वहीँ पर वह सूक्ष्मदृष्टि द्वारा जाना जाता है । 
श्रुति में कहा है- 
“शरीररहित, महान्, विभु, आनन्दस्वरूप, अक्षर ब्रह्म सर्वशरीरों में रहता है’- ऐसा जानकर धीर पुरुष कोई शोक नहीं करता ।” भागवत में भी यही कहा है- 
“जो स्थिति, उत्पत्ति एवं प्रलय का कारण है, परन्तु स्वयं अकारण है । जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति में और बाहर भीतर रहता हुआ देह, इन्द्रिय, प्राण एवं हृदय को जीवित रखता है; हे राजन ! वही परमात्मा है-ऐसा जानो ॥४२॥” 
*मुझ ही मैं मेरा धणी, पड़दा खोलि दिखाइ ।* 
*आत्म सौं परमात्मा, प्रकट आण मिलाइ ॥४३॥* 
*भरि भरि प्याला, प्रेम रस, अपणे हाथ पिलाइ ।* 
*सतगुरु के सदिकै किया, दादू बलिबलि जाइ ॥४४॥* 
आपने ठीक ही कहा कि प्राणियों के अन्तकरण में परमात्मा रहते हैं, तथापि वह दीखता तो नहीं, क्या कारण है? यदि वह अन्तःकरण अविद्या के आवरण से आवृत है तो यह आवरण भी आप ही भंग करें । वह पर्दा आप ही हटावें । जिससे मैं उसको देख सकूँ और हम दोनों की एकता हो जाय ।
यदि वह पराभक्ति से देखा जा सकता है, जैसे कि गीता में लिखा है- 
“मैं वेद, तपस्या, दान एवं यज्ञादि साधनों से ऐसा नहीं देखा जा सकता, जैसा कि तुम मुझे देख रहे हो” तो फिर वह प्रेमा भक्ति भी आप प्रदान करें; क्योंकि मैं तो सर्वथा आप की शरण में हूँ । अधिक क्या कहूँ, मैं तो आपके चरणारविन्दों में पड़ा हुआ नमस्कार कर रहा हूँ ॥४३-४४॥
(क्रमशः)

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