शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

= *निष्पक्ष मध्य का अंग ८८(२१/२४)* =

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*दादू हिन्दू तुरक न होइबा, साहिब सेती काम ।*
*षट् दर्शन के संग न जाइबा, निर्पख कहबा राम ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*निष्पक्ष मध्य का अंग ८८*
अनन्त नाम प्रभु पहुप हैं, प्राणि पाणि पख दोय । 
रज्जब करहि सुगंध सों, हिये हाथ ले जोय ॥२१॥ 
जैसे पुष्प हाथ में लेने पर दोनों ही हाथों को सुगंध प्रदान करते हैं, वैसे ही देखो, प्रभु के अनन्त नाम हिन्दू मुसलमान दोनों पक्षों वाले प्राणियों को ही हृदय में चिन्तन करने से शान्ति देते हैं । 
रज्जब महादेव को आदम कहिये, गोरख तन सु हाजी । 
इष्ट एक द्वै द्वै पखहुं, किस रूठे किस राजी ॥२२॥ 
मुसलमान महादेव को आदम कहते हैं और गोरक्षनाथ के शरीर को हाजी कहते हैं, हिन्दु-मुसलमान दोनों पक्षों के लोग उक्त दोनों को इष्ट मानते हैं, तब किस से रुष्ट हो और किसके राजी हो, अत: निष्पक्ष मध्य मार्ग में ही रहना चाहिये । 
रच१ हि न हिन्दू तुरक सौं, विदुजन२ विरचे३ नाँहीं । 
नारायण रूपी सुनर, निरपख४ न्यारे माँहिं ॥२३॥ 
निष्पक्ष विद्वान१-जन न तो हिन्दु-मुसलमानों से प्रेम२ करते ओर न विरक्त३ होते । नारायण स्वरूप श्रेष्ठ नर सब में रहते हुये भी निष्पक्ष४ भाव द्वारा सबसे अलग ही रहते हैं । 
रज्जब साधू शूर का, मरणा ह्वै मैदान । 
पशु पक्षी पिंड हिं भखै, नाँहिं गोर समान ॥२४॥ 
निष्पक्ष मध्यमार्ग के संत तथा शूरवीरों की मृत्यु मैदान में ही होती है और उनके शरीर को पशु पक्षी भक्षण करते हैं, वे मुसलमानी पक्ष से कब्र में नहीं दबाये जाते और हिन्दु पक्ष से श्मशान में नहीं जलाये जाते । 
(क्रमशः)

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