शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*एक देश हम देखिया, नहिं नेड़े नहिं दूर ।*
*हम दादू उस देश के, रहे निरंतर पूर ॥*
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साभार ~ oshostsang.wordpress.com

जो भी हो, बोध से हो तो शुभ, प्रयत्न से हो तो अशुभ। सर्वदा निर्भय और निर्विकार ज्ञानी को कहां अंधकार है, कहां प्रकाश है, और कहां त्याग है? कुछ भी नहीं है। हमने सदा सुना है कि परमात्मा प्रकाश है। कभी कभी कुछ थोड़े से रहस्यवादियों ने ऐसा भी कहा है, परमात्मा अंधकार है, पर बहुत थोडे।
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*अष्टावक्र कहते हैं, वह परम सत्य न तो प्रकाश जैसा है न अंधकार जैसा है। वहां कहां अंधकार, कहां प्रकाश, द्वन्द वहां नहीं है। तो जहां दो नहीं हैं वहां सब दो गिर गये। हमने अब तक जितने भी जोड़े जाने थे, वे सब गिर गये, जीवन-मृत्यु, अंधकार प्रकाश, लाभ-हानि, सफलता असफलता, सुखदुख, अपना पराया। सब गिर गये। वहां दो के सब जोड़े गिर गये। वहां तो दोनों मिल गये एक में।*
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यदि प्रकाश और अंधकार मिल जायें तो क्या होगा? कहने का कोई उपाय नहीं है, क्या होगा। एक बात निश्चय है कि वह तो न प्रकाश जैसा होगा, न अंधकार जैसा होगा। कुछ बिलकुल अनूठा होगा, अपूर्व, रहस्यमय, अनिर्वचनीय; जिसको कहा न जा सके। हम तो जो भी कहेंगे वह दो में बंट जायेगा। किसी को कहा सुंदर, तत्क्षण कुरूपता भीतर आ गई। किसी को कहा ऐसा, तो उससे विपरीत समाविष्ट हो गया। हम तो विपरीत से बच ही नहीं सकते। बोले कि विपरीत से फंसे। भाषा तो विपरीत में उलझी है। भाषा तो द्वन्द की है। इसलिए तो मौन का इतना. इतना बहुमूल्य आदर किया गया है।
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*मौन का अर्थ है, भाषा के बाहर होना। ऐसे स्थान पर पहुंचना भीतर, जहां शब्द न हों। जहां शब्द नहीं वहीं ब्रह्म है। जहां शब्द खो गया वहीं ब्रह्म है। वहां एक बचा। वहां कहने का कोई उपाय नहीं। कोई कोटि नहीं बनती, कोई गणित नहीं बैठता।
'सर्वदा निर्भय और निर्विकार ज्ञानी को कहां अंधकार है, कहां प्रकाश है, कहां त्याग है? कुछ भी नहीं है।’*

और यह भी हम समझें कि सौ में निन्यानबे शास्त्रों ने परमात्मा को प्रकाश कहा है। उसका कारण शास्त्र में नहीं है, उसका कारण मनुष्य के भय में है। मनुष्य बहुत डरा हुआ है अंधकार से। अंधकार में भय होता है। प्रकाश हो जाता है तो थोड़ा भरोसा आता है। कुछ दिखाई तो पड़ता है। अंधकार में तो उसी को घबड़ाहट नहीं होती जिसको अपने भीतर दिखाई पड़ता है।
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जिसको केवल बाहर ही देखने का पता है और जिसके भीतर तो कुछ भी प्रकाश नहीं है वह अंधकार में बहुत भयभीत हो जाता है। क्योंकि अंधकार हुआ तो अंधे हुए। अब कुछ दिखाई नहीं पड़ता। सारा संसार खो गया, जो दिखाई पड़ता था। दृश्य खो गया। अंधकार में दृश्य खो जाता है। अंधकार में तो सिद्ध ही राजी हो सकता है। क्योंकि अंधकार हो कि प्रकाश हो, दृश्य में सिद्ध को कोई रुचि नहीं है। वह तो द्रष्टा में लीन है। वह तो देखनेवाले में है।
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हम गहरे से गहरे अंधकार में भी बैठेंगे तो हम हैं। एक वस्तु अंधकार में भी अनुभव होती रहती है, वह है मेरा होना, वह अंधकार के पार है। उसे जानने के लिए प्रकाश की कोई आवश्यकता नहीं। उसका अपना निजी प्रकाश है। वह स्वयं प्रकाशी है। उसके लिए किसी प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं। वह स्वत: प्रमाण है। आंख बंद करके जिसे उस भीतर के प्रकाश का बोध होने लगा वही अंधकार में भयभीत नहीं होगा। मनुष्य अंधकार से भयभीत हैं इसलिए परमात्मा को प्रकाश कहा।
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या जिन्होंने भीतर के सत्य को जानकर भी परमात्मा को प्रकाश कहा है, उन्होंने भी इसी अर्थ में कहा है कि जब हम बाहर से भीतर आते, बाहर एक तरह का प्रकाश है, फिर एक तरह का प्रकाश भीतर है। और भीतर का प्रकाश बाहर के प्रकाश से ज्यादा गहरा है। परन्तु यह भी अंतिम बात नहीं है, यह भी यात्रा की ही बात है।
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पहला अनुभव बाहर प्रकाश है, संसारी का अनुभव है, बहिर्मुखी का। दूसरा अनुभव भीतर प्रकाश है, अंतर्मुखी का अनुभव है। परन्तु अष्टावक्र तो परम वाक्यों में विश्वास रखते हैं। वे कहते हैं, जहां अंतर और बाहर भी क्षय हो गये, बहिर्मुखी अंतर्मुखी भी मिट गये; वह भी द्वंद्व गया, फिर वहां कैसा अंधकार, कैसा प्रकाश।
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तो भीतर से भी भीतर एक स्थान है। पहले बाहर से भीतर आना है, फिर भीतर से भी भीतर जाना है। बाहर से तो मुक्त होना ही है, भीतर से भी मुक्त होना है। एक ऐसी भी घड़ी है जब न तो हम बाहर रहेंगे, न भीतर रहेंगे। उस घड़ी ही परम क्रांति घटती है। वहां न प्रकाश है, न अंधकार है।

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