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*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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७९ - दीपचन्दी
मेरा मन लागा सकल करा१,
हम निशदिन हिरदै सो धरा ॥टेक॥
हम हिरदै माँहीं हेरा, पीव परकट पाया नेरा ।
सो नेरे ही निज लीजे, तब सहजैं अमृत पीजे ॥१॥
जब मन ही सौं मन लागा, तब ज्योति स्वरूपी जागा ।
जब ज्योति स्वरूपी पाया, तब अंतर माँहिं समाया ॥२॥
जब चित्त हि चित्त समाना, हम हरि बिन और न जाना ।
जाना जीवन सोई, अब हरि बिन और न कोई ॥३॥
जब आतम एकै बासा, परमातम माँहिं प्रकाशा ।
परकाशा पीव पियारा, सो दादू मींत हमारा ॥४॥
इति राग गौड़ी समाप्त: ॥ १ ॥ पद ७९ ॥
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जिसने सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न किया१ है वही मेरे मन को प्रिय लग रहा है और हम ने रात - दिन उसी को हृदय में रखा है ।
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हमने उसे ध्यान द्वारा हृदय में खोजा था, इसलिये वह परमात्मा अति समीप हृदय में ही प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त हुआ है । उसे ध्यान द्वारा समीप निज हृदय में ही प्राप्त करो, तब ही अनायास आनँदामृत पान कर सकोगे ।
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जब हमारा मन, मन की अंतर वृत्ति के द्वारा परब्रह्म के चिन्तन में लगा, तब ही ज्योति - स्वरूप से जगमगाते हुये परब्रह्म को हमने देखा और जब ज्योति - स्वरूप से उसे प्राप्त किया तो उसी में समा गये ।
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इस प्रकार जब चित्त, चित्त की अन्तर्मुखता के द्वारा, उसमें लीन हुआ तब हमें परब्रह्म से भिन्न कुछ भी ज्ञान न रहा । हमने उसी परब्रह्म को अपना जीवन समझा है । अब प्रभु के बिना अन्य कोई भी सत्य नहीं भासता ।
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जब भीतर परमात्म - प्रकाश प्रकट होकर, आत्मा का परमात्मा में अद्वैत रूप से वास हो गया तो अब वह प्रकाश - स्वरूप प्रियतम परब्रह्म ही हमारा मित्र है ।
इति श्री दादू गिरार्थ प्रकाशिका राग गौड़ी समाप्त: ॥ १ ॥
(क्रमशः)

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