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*दादू जन ! कुछ चेत कर, सौदा लीजे सार ।*
*निखर कमाई न छूटणा, अपने जीव विचार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ चितावणी का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *उदारता*
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पंजाब केसरी महाराज रणजीतसिंह कहीं जा रहे थे । अकस्मात एक ढेला आकर उनके लगा । उन्हें बड़ी पीड़ा हूई ।
साथियों ने एक बुढिया को लाकर उनके सामने खड़ा कर दिया । भय से कांपती हुई बुढिया बोली - सरकार मेरा बच्चा तीन दिन से भूखा है, खाने को कुछ न मिला है । मैने पके बेल को ढेला मारा था, मेरे दुर्भाग्यवश वह बेल के फल के न लग कर आपके लग गया । क्षमा कीजिये ।
बुढिया की बात सुनकर महाराज रणजीत सिंह ने कहा - बुढिया को एक हजार रुपया और खाने का समान देकर आदरपूर्वक घर भेज दो ।
साथी - महाराज इसने आपको ढेला मारा है, इसे तो कठोर दण्ड मिलना चाहिये ।
रणजीतसिंह - जब बुद्धिहीन वृक्ष ढेला मारने से फल देता है तब मैं बुद्धिमान होकर भी इसे दण्ड कैसे दे सकता हूँ ।
पीड़ाप्रद को भी सु दे, धन से मुदित उदार ।
बुढिया कौ रणजीत ने, रुपये दिये हजार ॥१७२॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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