रविवार, 13 अक्टूबर 2019

= ११० =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू मन ही मरणा ऊपजै, मन ही मरणा खाइ ।*
*मन अविनासी ह्वै रह्या, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥*
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*'अपने में स्थित होकर, युक्ति, श्रवण और स्वानुभव के द्वारा अपने को ही सबका आत्मरूप जान कर साधक का मन नाश होता है।'* मन दब तो जाता है, दबाने में थोड़ी कठिनाई होती है; छिप भी जाता है, हालांकि छिपाना भी मुश्किल है। लेकिन मनोनाश, आख़िरी कदम है। मन शांत भी हो जाये, तो कल फिर अशांत हो जाता है; फिर जग जाता है, जाग-२ जाता है। बीज बना रहे तो बार-२ अंकुरण हो जाता है।
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कितनी ही प्रार्थना करें, कितना ही प्रभु-स्मरण, कितना ही जप। कभी लगता है कि सब ठीक, और क्षण भर में ही सब बिगड़ गया। कभी लगता है मिल गई मंजिल, और फिर सब खो जाता है। ख्याल भर आ जाये कि सब ठीक हो गया कि सब गड़बड़ हो जाता है।
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मन बहुत बार लगेगा कि गया और फिर लौट आएगा। झलकें मिलेगीं। इतना भी हो जाता है, तो भी मन के पार की झलक मिलती है। लेकिन ज्यादा देर यह नहीं चलता। सिद्ध तो तभी होता है मनुष्य जब मनोनाश हो जाता है। और मनोनाश तभी होता है जब ये ज्ञात हो जाये कि मैं आत्मा नहीं हूं। जब तक ये लगता है कि नहीं हूं शरीर, नहीं मन; लेकिन आत्मा तो मैं हूं, जब तक मैं को कोई सहारा बाकी है तब तक मन बीज-रूप में बना रहेगा। जब मैं ही नहीं बचता, तब ही मन मिटता है।

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