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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= फुटकर काव्य २.गूढार्थ - १/२ =*
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*दोहा*
*शिव चाहत है आपनौं बिधि नीकैं करि धारि ।*
*विष्णु इहै निशि दिन रहै व्याप न शील बिचारि ॥१॥*
[ कुछ विद्वान् “चौबोला” एवं “गूढार्थ” – दोनों प्रकरणों को एक ही प्रकरण में भी रखते हैं । पूर्व प्रकरण में एक एक दोहा के चार-चार अर्थ के साथ अन्य अर्थ भी निकलते हैं, परन्तु इस उत्तर प्रकरण में सभी दोहों में ऐसा नहीं है । अतः इस प्रकरण को पृथक संगृहीत किया है । यह भी अन्तर्लापिका का एक भेद है । इसमें शब्दालंकार के साथ अर्थालंकार की भी झलक है ॥ ]
प्रथम छन्द : (क) यदि तूं अपना कल्याण चाहता है तो अपनी साधना का अभ्यास उचित रीति से कर; क्योंकि साधना में विविध प्रकार के विघ्न आते रहते हैं । उनका भी निवारण आवश्यक है ॥
(ख) शिव, ब्रह्मा एवं विष्णु – ये तीनों देवता सत्त्व, रज, तम – इन तीन गुणों के, सृष्टिक्रम में माया विशिष्ट ब्रह्म के प्रधान स्वरूप हैं, पर(अतीत) शील के विचारमात्र से इस तुरीय अवस्था प्राप्त नहीं की जा सकती; अपितु अन्तरात्मा का साक्षात्कार ही व्यापकता तक पहुँचा सकता है ॥१॥
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*बासुदेव हित छाडिकैं प्रद्युम्नहि मन दीन्ह ।*
*अनिरुद्धहि कियौ सदा संकर्षण नहिं कीन्ह ॥२॥*
द्वितीय छन्द : - (क) परमात्मा का त्याग कर केवल काम(विषय) आदि की यथेच्छ(अनर्गल) प्रवृति से संयमादि द्वारा मन का नियन्त्रण तुरीय अवस्था तक नहीं पहुँचा जा सकता, अपितु मन की उस अर्नगल प्रवृति को रोककर परमात्मा का ध्यान वहाँ तक पहुँचा सकता है ॥
(ख) वासुदेव(श्रीकृष्ण), प्रद्युम्न(श्रीकृष्ण पुत्र), अनिरुद्ध(श्रीकृष्ण के पौत्र) का नाम लेते रहने पर भी यदि साधक ने संकर्षण = बलराम(श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता) का नाम नहीं लिया तो साधना की वह(तुरीय) अवस्था प्राप्त नहीं होती ॥२॥
(क्रमशः)

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