🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू कौवा बोहित बैस कर, मंझि समंदाँ जाइ ।*
*उड़ि उड़ि थाका देख तब, निश्चल बैठा आइ ॥*
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मनुष्य सब तरफ दौड़ चुका होता है और प्रत्येक तरफ हार जाता है; सब पा लेता है, और सब व्यर्थ हो जाता है; खोज पूरी हो जाती है और पूरे होते ही नकार हो जाता है; सब शून्य हो जाता है।
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हाथ में आते ही सब मिट्टी सिद्ध होता है; दूर सब सोना प्रतीत होता है; जैसे-2 पास आता है, सब मिट्टी होने लगता है। जिस क्षण मनुष्य को ये अनुभव हो जाता है कि सब दौड़ व्यर्थ है; जिस क्षण ये ज्ञात हो जाता है कि दौड़कर भी कुछ न मिला, उस क्षण से दौड़ बंद हो जाती है। और दौड़ बंद होते ही वह दिखाई देने लगता है, जो दौड़ने के कारण दिखाई नहीं पड़ रहा था। यदि सारी ही दौड़ व्यर्थ हो जाये तो दृष्टि घूम जाती है; अब तक बाहर देखती थी, अब भीतर देखती है।
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जब संसार में कुछ भी देखने योग्य नहीं लगता, पाने योग्य नहीं लगता, खोजने योग्य नहीं लगता; जब संसार वासना नहीं रह जाता। इसलिए सारे शास्त्रों ने निर्वासना पर इतना जोर दिया है। वासना है दूर जाने की व्यवस्था, निर्वासना है पास आने का द्वार।
'शरीर के भीतर छिपा है वह अजन्मा नित्य।'
कभी जन्म नहीं हुआ-
और सदा है,
और सदा है,
और सदा है।
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ऐसा जो अजन्मा नित्य है, वह इसी शरीर के भीतर छिपा है। लेकिन शरीर को इसका कोई पता नहीं। कभी अनुभव किया? शरीर की भीतर की ओर दौड़ मनुष्य यदि अनुभव कर ले तो अभी समाधि उपलब्ध हो जाये। मनुष्य ने सदैव अपने शरीर की दौड़ बाहर की तरफ अनुभव की है। सुंदर काया देखी, शरीर दौड़ने लगा; पुलक आ गई। सुन्दर फूल देखा, दृष्टि भागने लगी। सुन्दर ध्वनि सुनाई दी, कान भागने लगे। शरीर सदा बाहर की तरफ भागता है। मनुष्य ने शरीर को कभी भीतर की तरफ भागते अनुभव नहीं किया; तो शरीर को पता कैसे चले कि भीतर कौन छिपा है? शरीर अपरिचित रह जाता है उससे, जिसका वह शरीर है। सब दौड़ बाहर की ओर है, इसीलिये भीतर अज्ञान छा जाता है।

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