शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019

= १२० =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*विष अमृत घट में बसै, विरला जानै कोइ ।*
*जिन विष खाया ते मुये, अमर अमी सौं होइ ॥*
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साभार ~ badgujarmahesh.wordpress.com

आस-पास परिवार में, पड़ोस में, गांव में, मृत्यु होती है; लेकिन मनुष्य को कभी गहरे में ये प्रतीति नहीं होती कि मेरी भी मृत्यु होगी। जरूर कोई गहरी बात है, क्योंकि मृत्यु की इतनी घटना घटती है कि ये प्रतीति न आये; ये एक आश्चर्य है। मृत्यु घटित होते देखकर भी गहरे अन्तस् में ये सत्य नहीं प्रवेश करता कि मेरी भी मृत्यु होगी। यद्यपि विचार करने पर कुछ क्षणों के लिए इस सत्य की प्रतीति अवश्य होती है, लेकिन भीतर से परम स्वीकार नहीं निकलता।
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जब मृत्यु प्रतिदिन घटित हो रही है, प्रत्येक मनुष्य मृत्यु की पंक्ति में ही खड़ा हो;वहां भी मनुष्य इतनी मौज से जीवन जी रहा हो, तो अवश्य ही भीतर कोई कारण है।
कारण ये है कि भीतर जो है,वह शाश्वत है। मनुष्य कितना ही शरीर से जुड़ गया हो, फिर भी मनुष्य शरीर नहीं है। भीतर का शाश्वत सत्य झुठलाया नहीं जा सकता। कितनी भी बेहोशी हो-भीतर का ये सत्य-गूंजता ही रहता है। बेहोशी मनुष्य की गहरी और जन्मों-2 की है, लेकिन इतनी भी नहीं है कि होश को पूरा समाप्त कर दे।
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होश उभर-2 कर प्रकट हो ही जाता है। अंतस में मनुष्य के ये प्रतीति कहीं अवश्य बनी रहती है कि मैं नही मरुंगा। मनुष्य इस तरह जीवन जीता है, जैसे सदैव संसार में ही रहेगा। इसीलिये बहुत सी भूलें करता है। उन भूलों में भी सत्य की झलक है, नहीं तो ये भूलें होना समाप्त हो जाता। प्रत्येक स्थिति में शाश्वत होने की झलक स्थिर रहती है।

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