🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*साचे को झूठा कहैं, झूठा साच समान ।*
*दादू अचरज देखिया, यहु लोगों का ज्ञान ॥*
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शरीर मनुष्य का है, लेकिन मनुष्य शरीर नहीं है। चेतना शरीर में है, लेकिन शरीर चेतना नहीं है। शरीर पहली पर्त है, जिससे चेतना का तादात्म्य हो गया है। चेतना लम्बे समय तक शरीर के साथ है,जुड़ी हुयी है शरीर से; इसीलिये विस्मरण हो गया है कि कौन, कौन है। इस भूल को साथ मिलता है क्योंकि बाहर से देखने वाला शरीर को देखता है, चेतना को नहीं देखता।
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और बाहर पूरी भीड़ है,मनुष्य अकेला है। भीड़ मनुष्य को शरीर ही मानती है, उन सबों की प्रतीति मनुष्य को प्रभावित करती है। शरीर यदि कुरूप है, तो भीड़ कहती है कि कुरूप हो, शरीर यदि सुंदर है, तो भीड़ कहती है कि सुंदर हो, शरीर जवान है, तो कहती है कि जवान हो, शरीर वृद्ध हो गया है, तो कहती है कि वृद्ध हो; ऐसा कहने वालों की संख्या बड़ी है, मनुष्य अकेला है।
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उन सब की प्रतीति मनुष्य के इस भाव को गहराती है कि मैं शरीर हूं। उनमे से कोई भी चेतना को कभी नहीं देखता। बाहर की आंख बाहर ही देख सकती है, और सारी परेशानी मनुष्य के लिए बाहर की आंखे ही हैं; क्योंकि सभी तरफ आंखे ही आंखें हैं, वे सब शरीर ही देखती हैं। उनकी धारणा मजबूत है, मनुष्य अकेला है; इसीलिये उनसे हार जाता है, इसमें आश्चर्य नहीं है।
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आश्चर्य तब है जब मनुष्य इन आंखो से बच कर स्वयं को पहचान लेता है कि मैं शरीर नहीं हूं। समाज से मुक्त होने का ये ही अर्थ है - चारों तरफ भीड़ की आंखें जो इंगित करती हैं - उससे मुक्त हो जाना। ये बेहद कठिन है। क्योंकि सभी एक ही बात दोहराते हैं, और दोहराये जाने के कारण ये मन्त्र हो जाता है।

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