बुधवार, 23 अक्टूबर 2019

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*धरती अम्बर रात दिन, रवि शशि नावैं शीश ।*
*दादू बलि बलि वारणें, जे सुमिरैं जगदीश ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *तप* 
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स्थूलशिरा नामक ऋशि सुमेरू पर्वत पर तप करते थे । उनके समीप की वनस्पतियों के सुन्दर सुन्दर फूलों से बड़ी सुन्दर सुगन्ध आती थी । इससे नेत्र इन्द्रियों फूलों के सौन्दर्य से और नासिका सुगन्ध से चंचल होती थी। इन्द्रियों की चंचलता से तप में विध्न जानकर ऋषि ने शाप दे दिया कि - "मेरे आश्रम के आस-पास इतनी दूर तक किसी भी वनस्पति के पुष्प नहीं आवे ।" वैसे ही हुआ । इससे सूचित होता है कि तपोबल से प्रकृति का नियम भी बदल जाता है ।
प्रकृति नियम भी बदलता, तपबल से तत्काल ।
स्थूलशिरा के शाप से, फूल बन्ध सब का ॥२४१॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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