बुधवार, 23 अक्टूबर 2019

गुरुदेव का अंग ९५/९८

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)
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*गुरु शिष्य परमोध* 
*सतगुरु शब्द उलंघि करि, जनि कोई सिष जाइ ।* 
*दादू पग पग काल है, जहाँ जाइ तहँ खाइ ॥९५॥* 
गुरु के निष्काम कर्म बोधक शब्दों का उल्लंघन नहीं करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करने वाले को पद-पद पर आपत्ति आ जाती है । वह जहाँ भी जायेगा वही मृत्यु का ग्रास हो जायेगा । आत्मोपनिषद् में कहते हैं- 
“ब्रह्मज्ञानी विद्वान् काम्य कर्मों को त्यागकर ममता और अहंकार से रहित निष्काम भाव से अकेला ही सुख से विचरता है” ॥९५॥
*सतगुरु बरजै सिष करै, क्यूँ कर बंचै काल ।* 
*दहदिश देखत बह गया, पाणी फोड़ी पाल ॥९६॥* 
“जो कुत्सित कर्म करने वाले हैं अपने उन कुत्सित कर्मों के कारण कुत्सित योनि में जन्म लेते हैं”- इत्यादि श्रुतियाँ निषिद्ध कर्म करने वाले का नीच योनि में जन्म लेना बताते हैं; अतः निषिद्धकर्म नहीं करना चाहिये । 
गुरु भी निषिद्धाचरण का निषेध करते हैं । फिर भी शिष्य यदि निषिद्ध कर्म करता है तो वह जन्म-मरण रूपी काल से मुक्त नहीं हो सकता । प्रत्युत जैसे जल बाँध को तोड़ कर बाहर चला जाता है और इधर-उधर बिखर जाता है । उसी प्रकार साधक मर्यादारुपी बाँध को तोड़कर पतित हो जाता है । लिखा है- 
“प्रयत्नपूर्वक पूछने पर, यदि प्रामाणिक वक्ता की बात को नहीं मानता है जो उससे बढ़कर कौन नराधम होगा ।” 
महाभारत में कहा है- 
“जो गुरु के वचनों का उल्लंघन करता है उसको भयंकर शरीर वाले कुत्ते, लौहसदृश कठोर चोंच वाले पक्षी बलवान् गीध तथा अन्य जो खून पीने वाले हैं वे उस शिष्य को मरने के बाद नरक में खाते हैं ॥९६॥” 
*दादू सतगुरु कहै सो सिष करै, सब सिधि कारज होइ ।* 
*अमर अभय पद पाइये, काल न लागै कोई ॥९७॥* 
जो शिष्य सद्गुरु की आज्ञा के अनुसार व्यावहारिक व पारमार्थिक सारे अच्छी तरह करे तो उसके समग्र कार्य सिद्ध हो जायेंगे और अन्त में अमर अभय पद को भी प्राप्त हो जायेगा तथा काल के भय से भी मुक्त हो जायगा ॥९७॥ 
*दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो हम थैं जनि होइ ।* 
*सतगुरु लाजै आपना, साध न मानै कोइ ॥९८॥* 
शिष्य को शास्त्रनिषिद्धकर्म नहीं करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करने से उन गुरु को भी लज्जा का भागी बनना पड़ेगा, और कोई अन्य साधु-महात्मा भी उस कर्म का अनुमोदन नहीं करेंगे । अतः शास्त्रविहित कर्म ही काना चाहिये, न कि निषिद्ध । ब्रह्मविद्योनिषद् में लिखा है- 
“हँसविद्या के विना परमात्मा की प्राप्ति का अन्य कोई उपाय नहीं है । जो गुरु परमेश्वर को प्राप्त करा देने वाली ‘हंसविद्या’ नाम की इस महाविद्या को देता है उसकी सदा शुद्ध बुद्धि से सेवा करनी चाहिये ।” 
और इस जगत् में शुभ, अशुभ या अन्य जो कुछ भी गुरु ने कहा हो उसको संतोषवान् शिष्य, विना विचारे ही पूर्ण कर डाले । इस हँसविद्या को मनुष्य गुरुसेवा से ही प्राप्त कर सकता है” ॥९८॥
(क्रमशः)

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