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*जे कुछ भावै राम को, सो तत कह समझाइ ।*
*दादू मन का भावता, सबको कहि बनाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ मन का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *विचार*
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एक विचारहीन रोगी को वैद्य पथ्य बता रहे थे । रोगी खाने का लालची था । उसकी प्रकृति जानने वाला एक मनुष्य भी वहां खड़ा था । उसने कहा - "इसे तो हलवा खिलाओ । यह सुनकर रोगी वैद्य का अनादर करते हुये और सब लोगों को सुनाते हुये जोर से बोले - तुम लोग सब के सब वैद्य की बातें सुन रहे हो और वह दूर खड़ा कैसी अच्छी बात कर रहा है, उसकी क्यों नहीं सुनते ? इससे ज्ञात होता है कि विचारहीन सुहृद बातें न सुनकर दु:ख के साधन ही अपनाता है ।
बिन वेचार से सुहृद की, वाणी भी न सुहात ।
रोगी बोला जोर से, उसकी सुनो न बात ॥२१॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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