गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

= ७१ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*जहँ सेवक तहँ साहिब बैठा, सेवक सेवा मांहि ।*
*दादू सांई सब करै, कोई जानै नांहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
====================
साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
.
*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु**भाग 3**भक्त*
#########################
बूंदी में एक रामदास नाम के वैश्य भक्त थे । विणजी करके ग्रामों से अनाज लाया करते थे ।
एक दिन उनका सब समान बिक जाने से अनाज का भार अधिक हो गया तथा मार्ग भी लम्बा था, वे थक भी गये थे । भक्त को थका जान कर भगवान एक जाट के रूप में रामदासजी के पास आकर बोले - 'सेठजी ! आप थक गये हैं लाओ आपकी पोट मैं ले चंलू ।' रामदास ने दे दी । 
पोट लेकर भगवान शीध्र गति से चल पड़े । रामदास पीछे से सोचने लगे कि न जाने जाट कहां का है, वह घर क्यों जाने लगा, आज का अनाज गया ही समझना चाहिये किन्तु घर जाते ही स्नान के लिये गरम जल और भोजन के लिये कड्ढी फुलका मिल जाय तो अच्छा हो । जीम कर विश्राम करूं ।' ऐसे सोचते जा रहे थे । 
भगवान तो सबके मन की जानने वाले ठहरे । घर पर जाकर अनाज का पोट संभला करके सेठानी से कहा - सेठ के स्नान के लिये गर्म जल ओर भोजन के लिये कड्ढी फुलका तैयार रखना । फिर वहां ही और भोजन तैयार मिलने से उन्होंने सेठानी से पूछा - 'मेरे मन की बात का तुझे कैसे पता लगा ।' सेठानी - 'अनाज की पोट लाने वाला कह गया था ।' 
अब रामदासजी की आंखे खुली ध्यान धर के देखा तो वे तो साक्षात भगवान ही थे । इससे सूचित होता है कि भक्त का भार भी भगवान सहर्ष ढोते हैं ।
निज भक्तों का भार भी, ढोवें हरि सह प्रेम।
रामदास की पोट शिर, लेय दिया जन क्षेम ॥३९२॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें