🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*सो दशा कतहूँ रही, जिहिं दिश पहुँचे साध ।*
*मैं तैं मूरख गहि रहे, लोभ बड़ाई वाद ॥*
==================
साभार ~ Raj Gupt
परमात्मा की महिमा यही है कि उसने तुम्हें स्वतंत्र बनाया है, उसने परिपूर्ण स्वतंत्रता दी है। वह कोई तानाशाह नहीं है, और न ही उसने कोई इमरजेंसी की अवस्था घोषित कर रखी है। परमात्मा मनुष्य को गरिमा दिया है, परिपूर्ण स्वतंत्र होने की।
.
निश्चित ही स्वतंत्रता में खतरा है। स्वतंत्र होने का अर्थ ही यह है कि दुख भोगने की भी स्वतंत्रता है, सुख भोगने की भी। स्वतंत्रता का अर्थ ही यह है कि अपने को नष्ट कर लेने की भी स्वतंत्रता है, अपने को सृजन करने की भी। स्वतंत्रता का सीधा अर्थ है कि तुम जो भी होना चाहो..अगर तुम दुख ही भोगना चाहो तो भी बाधा न दी जाएगी। तुम्हारे ऊपर ही सब छोड़ दिया है।
.
यही मनुष्य के लिए जोखिम है, यही उसका गौरव भी है कि वह स्वतंत्र है। वह अगर गिरना चाहे सीढ़ी से तो आखिरी खड्डे तक गिर सकता है, कोई रोकने न आएगा। वह चढ़ना चाहे तो कोई रोकने न आएगा; वह आखिरी ऊंचाई तक चढ़ सकता है।
.
नरक भी तुम हो, स्वर्ग भी तुम हो। तुम्हारा निर्णय ही आत्यंतिक है। तुम जिम्मेवारी किसी और पर मत छोड़ना। ऐसे ही तो तुमने सदा जिम्मेवारी किसी और पर छोड़ी है। और तब तुम निश्चिंत हो जाते हो, तुम सोच लेते हो कि मैं ही तुम्हें ठीक से डोज नहीं दे रहा हूं जागने का, नहीं तो तुम कभी के जाग गए होते।
.
तुम्हारे हृदय में तो छलनी हो गई है, तुम्हारा प्राण तो घाव हो गया है ! अब तुमने तुम्हारे तरफ से तुमने कोई कमी नहीं छोड़ी ! अगर कमी होगी तो मेरी तरफ से होगी ! इस तरह की गलतियों में मत पड़ो, क्योंकि इस तरह तो फिर तुम कभी भी न जाग सकोगे। ध्यान करो दुखी हो तो तुम्हीं कारण हो; सुखी हो तो तुम्हीं कारण हो। मैं तुम्हें जगा नहीं सकता; मैं तुम्हें जागने के उपाय बता सकता हूं।
.
बुद्ध ने कहा हैः मैं राह बता सकता हूं, चलना तुम्हीं को पड़ेगा। मैं तुम्हें चला नहीं सकता। और जो गुरु तुम्हें चलाने की कोशिश करे, जानना वह तुम्हारा दुश्मन है। क्योंकि अगर वह तुम्हें घसीटे, अपने कंधे पर रख कर चले, तुम्हारी बैसाखी बन जाए, तो फिर तुम्हारे पैर कभी भी चलने में समर्थ न होंगे। जिस दिन वह गुरु विदा होगा उस दिन तुम वहीं पहुंच जाओगे जहां तुम पाए गए थे। फिर तुम वहीं गड्डे में गिर जाओगे।
.
नहीं सदगुरु मार्ग दिखाते हैं, चलना प्रत्येक को स्वयं पड़ता है। जैसे एक छोटा बच्चा चलना शुरू करता है, कोई उसके लिए चल थोड़े ही सकता है। कई बार गिरेगा। बाप को कितनी इच्छा न होती कि मैं इसके पैर बन जाऊं ! मां की कितनी आकांक्षा न होती होगी कि इसके घुटनों में चोट लगती है, मैं इसकी सुरक्षा बन जाऊं; मैं इसके लिए चलूं, इसे कंधे पर रखे रहूं।
.
लेकिन अगर कोई मां ऐसा करे तो वह दुश्मन है, क्योंकि यह बच्चा फिर सदा के लिए पंगु हो जाएगा; यह कभी चल ही न सकेगा। नहीं, मां प्रेम से देखेगी; इशारा भी देगी कि चलो; दूर बैठे बच्चे को बुलाएगी कि आ जाओ; दोनों हाथ भी फैला कर कहेगीः घबड़ाओ मत, मैं मौजूद हूं; गिरोगे तो सम्हाल लूंगी।
.
हालांकि बच्चा फिर भी गिरेगा, क्योंकि बिना गिरे कभी कोई चलना सीखा है? अगर कोई बच्चा गिरे ही न, बार-बार सम्हाल लिया जाए, तो भी लंगड़ा हो जाए। गिरने भी देना होगा। घुटने पर चोट भी लगेगी, तो ही मजबूती आएगी शरीर की, व्यक्तित्व की, अपने पैरों पर खड़ा होना आएगा।
.
मैं तुम्हारी गुलामी नहीं बनना चाहता हूं; न तुम मुझ पर निर्भर होने की कोशिश करना। मैं चाहूंगा कि तुम परिपूर्ण स्वतंत्र हो जाओ, अपने पैर से चल सको; क्योंकि तुम्हारा मंदिर तुम्हारे चलने से ही तुम्हारे करीब आएगा। तुम्हारा परमात्मा तुम्हें लंगड़ों की तरह आया हुआ देख कर प्रसन्न न होगा। तुम्हें दौड़ते और नाचते हुए आते देख कर ही तुम्हारा स्वागत हो सकता है।
-- अकथ कहानी प्रेम की # 2
🙏🏻🙏🏻🙏🏻ओशो

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें