गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

= *सजीवन का अंग ८५(१७/२०)* =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*जे जन राखे राम जी, अपने अंग लगाइ ।*
*दादू कुछ व्यापै नहीं, जे कोटि काल झख जाइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*सजीवन का अंग ८५*
बसै निनामा१ नाम में, ताथै लीजै नाँउ२ । 
जन रज्जब ता रंध्र३ की४, मैं बलिहारी जाँउ ॥१७॥
नाम रहित१ ब्रह्म में बसते हैं, इसलिये नाम२ का चिन्तन अवश्य करना चाहिये । मैं तो उस३ नाम रूप गुफा४ की बलिहारि जाता हूँ । 
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रज्जब अज्जब ठौर है, सुमिरण में ठहराय । 
अमर सु आदम१ आतमा, सुख में सुरति समाय ॥१८॥
प्रभु का नाम स्मरण रूप स्थान अद्भुत है, उनमें मन स्थिर करने से वृति ब्रह्मरूप सुख में समायी रहती है, और मानव१ का आत्मा अमर हो जाता है । 
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रज्जब मन पंचों पिशुन१, लूटैं देही देश । 
इन बलवंतों पास२ छुड़ावै, बलवंत प्राणि नरेश ॥१९॥
दुष्ट१ देश को लूटते हैं, तब उन बलवान् डाकुओं की फांसी२ से बलवान राजा ही छुड़ाता है, वैसे ही पंच ज्ञानेन्द्रिय और ये जीवात्मा के ब्रह्मानन्द रूप धन को लूटते हैं अर्थात इनकी चपलता से ब्रह्मानन्द नहीं मिलता । इन छओं को विषय राग रूप पाश से ज्ञान बल युक्त सजीवन संत ही प्राणी को छुड़ा सकता है । 
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इन्द्रियों हाथ न आवही, अंतक१ गह्या न जाय । 
रज्जब आतम राम सम, नर देखो निरताय२ ॥२०॥
हे नरों ! विचार२ करके देखो, जो मन इन्द्रियों के अधीन नहीं होता और काल१ से नहीं पकड़ा जाता, वह संतात्मा राम के समान ही है । 
(क्रमशः)

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