गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*सजीवनि साधै नहीं, तातैं मर मर जाइ ।*
*दादू पीवै राम रस, सुख में रहै समाइ ॥*
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साभार ~ Atul Verma

अगर हम जीवन की धार को देखें, तो हम सब उलटे तैरने की कोशिश करते हैं। उलटे तैरने में एक मजा जरूर है, उसी कारण हम तैरते हैं। उलटे तैरने में अहंकार निर्मित होता है। अगर मैं दो हाथ उलटे मार लेता हूं तो लगता है, मैं कुछ हूं। धार के विपरीत, प्रवाह के विपरीत, मैं कुछ हूं। और अगर प्रवाह में बहता हूं तो फिर मैं कुछ भी नहीं हूं !
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लेकिन ध्यान रहे, समय की धार में कोई भी उलटा नहीं तैर सकता। नदी की धार में दो हाथ कोई मार भी ले। समय की धार में उलटा नहीं तैर सकता। क्योंकि समय पीछे बचता ही नहीं कि आप उसमें तैर सकें। नदी तो पीछे भी होती है। समय तो विलीन हो जाता है। एक ही क्षण आपको मिलता है, पिछला क्षण तो विलीन हो जाता है। अतीत तो बचता नहीं कि आप पीछे जा सकें। सिर्फ भविष्य ही बचता है। आगे ही जा सकते हैं, पीछे जाने का कोई उपाय नहीं।
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लेकिन मन पीछे जाने की कोशिश करता रहता है। उस विपरीत दौड़ में अहंकार निर्मित जरूर होता है, लेकिन हम समय के साथ एक होने का जो गहन अनुभव है, उससे वंचित हो जाते हैं।
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धार के साथ बह जाएं, कोई बाधा न डालें। नदी की धार के साथ एक हो जाएं। और जीवन जो भी ले आए, उसे परम आनंद से स्वीकार कर लें। उसमें रंचमात्र भी नकार न हो। उसमें रंचमात्र भी अस्वीकार न हो। उसमें शिकायत न हो। ऐसे ही आदमी का नाम धार्मिक आदमी है, जिसके मन में जीवन के प्रति शिकायत नहीं है। मंदिर जाने वाला आदमी धार्मिक नहीं है। क्योंकि हो सकता है, मंदिर वह सिर्फ शिकायत के लिए जा रहे हों। अधिक लोग तो मंदिर शिकायत के लिए जाते हैं। अधिक लोगों की प्रार्थनाएं यह बताती हैं कि भगवान, तुझसे ज्यादा तो हम समझते हैं! तू जो कर रहा है, वह गलत है। हम जो चाहते हैं, वह कर! हमारी प्रार्थनाएं, हमारे मंदिर, हमारी पूजाएं, हमारी मस्जिदें, हमारी शिकायतों के घर हैं।
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लेकिन जो आदमी शिकायत लेकर मंदिर गया है, वह मंदिर जा ही नहीं सकता। मंदिर में प्रवेश का तो एक ही मार्ग है कि कोई शिकायत न हो। जीवन ने जो दिया है, जीवन ने जो किया है, जीवन जैसा है, उसमें परम हर्ष हो, उसके स्वीकार में परम उत्सव हो, तब आप बहेंगे। और आपके और समय के बीच जो दुविधा मालूम पड़ती है, वह विलीन हो जाएगी। आप समय के साथ एक हो जाएंगे। इस समय के साथ जो एक होने की घटना है, उस घटना में ही आपको काल के अक्षय स्वरूप का बोध होगा। यह इटरनल टाइम क्या है !
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समय तो उसी दिन आपको पता चलेगा, जिस दिन आप तथाता को, टोटल एक्सेप्टेंस को उपलब्ध हो जाएंगे। उस दिन, यह कृष्‍ण जो काल का अक्षय स्वरूप कह रहे हैं, यह आपके अनुभव में आएगा। कभी चौबीस घंटे ही ऐसा करें कि बहकर देखें, तैरें मत। धार्मिक आदमी तैरता नहीं है, अधार्मिक आदमी तैरता है। धार्मिक आदमी बहता है। बहता है, कहना भी शायद ठीक नहीं। क्योंकि बहता है, इसमें भी ऐसा लगता है कि कुछ करता है। नहीं, धार्मिक आदमी धार के साथ एक हो जाता है। धार जहां ले जाती है, वहीं चला जाता है।
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लाओत्से ने कहा है कि मैंने एक सूखे पत्ते को देखा। वर्षों तक मैंने ध्यान किया। वर्षों तक मैंने पूजा की, प्रार्थना की। वर्षों तक मैंने उसको खोजा। लेकिन उसका मुझे कोई पता नहीं मिला। फिर एक दिन मैं बैठा था। पतझड़ के दिन थे, सूखे पत्ते वृक्षों से गिरकर उड़ रहे थे। और तब मैंने उस मौन शांत दोपहरी में देखा सूखे पत्तों को। और उसी दिन मुझे राज मिल गया।
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हवा सूखे पत्ते को बाएं ले जाए, तो सूखा पत्ता बायां चला जाता था। दाएं ले जाए, तो दाएं चला जाता था। ऊपर ले जाए, तो आकाश में उठ जाता था। जमीन पर पटक दे, तो नीचे विश्राम करने लगता था। सूखे पत्ते की अपनी कोई मर्जी ही न थी। सूखे पत्ते की अपनी कोई आकांक्षा न थी। सूखे पत्ते के हृदय में कोई भाव ही न था कि मैं कहां जाऊं। हवाएं जहां ले जाएं, वहीं जाने को राजी था। सूखे पत्ते ने अपना अस्तित्व ही खो दिया था।
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हमारी वासनाएं ही हमारा अस्तित्व हैं। हमारी आकांक्षाओं का जोड़ ही हमारा तथाकथित होना है। सूखा पत्ता हवाओं के साथ एक हो गया था। हवाएं आकाश में उठातीं, तो सिंहासन पर विराजमान होकर आनंदित होता। हवाएं नीचे गिरा देतीं, तो धूल में विश्राम करता, आनंदित होता।
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लाओत्से ने कहा, बस उस दिन से मैं भी सूखा पत्ता हो गया। और जिस दिन से मैं सूखा पत्ता हो गया हूं उस दिन से मैंने दुख नहीं जाना, अशांति नहीं जानी। और जिस दिन से मैं सूखा पत्ता हो गया हूं उस दिन से मुझे सत्य खोजना नहीं पड़ा; सत्य मौजूद ही था, वह मेरे अनुभव में आ गया है।
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काल की यह अक्षयता अनुभव में आए, तो परमात्मा का गहनतम रूप स्मरण में आना शुरू होता है।
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गीता दर्शन भाग–5, अध्याय—10
OSHO

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