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*ज्यों ज्यों होवै त्यों कहै, घट बध कहै न जाइ ।*
*दादू सो सुध आत्मा, साधू परसै आइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *मैत्री*
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एक व्यक्ति विदेश जाने को तैयार हुआ । उसने एक सन्दूक मे दस हजार रुपये रखकर बन्द किया । उसी दिन उसकी स्त्री ने उनमे से पांच सौ रुपये निकालकर सन्दूक बंद कर दिया । पुरुष को इस बात का पता नहीं था ।
वह सन्दूक को मित्र के घर रखकर विदेश चला गया, जब आया तो सन्दूक घर लाकर रुपये गिने । पांच सौ कम निकले । मित्र के पास जाकर कहा । मित्र ने अपने पास से पांच सौ रुपये दे दिये । घर आने पर स्त्री ने पूछा - कहां गये थे ? पुरुष - पांच सौ रुपये कम निकले थे सो लाया हूँ ।
स्त्री - वे तो मैंने ही निकाले थे । पुरुष ने यह कहकर कि तूने पहले क्यों नहीं कहा ।
रुपये लेकर मित्र के पास गया और बोला कि - हमारे रुपये तो घर में ही मिल गये । मित्र - मिल गये तो घर जाओ, कोई डर की बात नहीं । इसका नाम है मित्रता । मित्र के दोष को कथन करके उसे उलाहना न देकर सरलता से कह दिया कि - घर जाओ ।
श्रेष्ठ मित्र में सरलता, रहती है, सत जान ।
दिये रुपये पांच सौ, दोष न खरा बखान ॥१४९॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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