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*दादू अल्लाह राम का, द्वै पख तैं न्यारा ।*
*रहिता गुण आकार का, सो गुरु हमारा ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*निष्पक्ष मध्य का अंग ८८*
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हेत न कर हिन्दू धरम, तज तुरकी रस१ रीति ।
रज्जब जिन पैदा किया, ता ही सौं कर प्रीति ॥३३॥
मुसलमानी धर्म के प्रेम१ की रीति को त्याग और हिन्दू धर्म से भी प्रेम मत कर जिन प्रभु ने उत्पन्न किया है, उन्हीं से प्रेम कर ।
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रज्जब हिन्दू तुरक तज, सुमिरण सिरजन हार ।
पखा पखी सौं प्रीति कर, कौन पहुँचा पार ॥३४॥
हिन्दू-मुसलमानों की पक्ष को त्यागकर के सृष्टिकर्त्ता प्रभु का स्मरण कर, किसी एक पक्ष की पक्ष करने वाला कौन संसार के पार प्रभु के पास पहुँचा है ?
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द्वै पख दारा१ त्याग कर, प्राणी ले वैराग ।
जन रज्जब सो नीपजे२, ता शिर मोटे भाग ॥३५॥
हिन्दू मुसलमान दोनों ही पक्ष रूप नारी१ को त्यागकर वैराग्य धारण करता है, वही सिद्ध२ संत होता है और उसी का विशाल भाग्य कहा जाता है ।
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दोन्यों पख सोकणि१ रही, जब जीव जोगी होय ।
जन रज्जब किलकिल२ मिटी, नाम न लेवे कोय ॥३६॥
जब जीव निष्पक्ष योगी हो जाता है तब हिन्दू-मुसलमान दोनों पक्ष रूप सौत१ पीछा करने से रह जाती है और वाद-विवाद२ मिट जाता है, फिर कोई भी पक्ष वाला हमारी पक्ष में आओ ऐसा नाम भी नहीं लेता ।
(क्रमशः)

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