मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*प्राण न पिंड, रूप नहिं रेखा,*
*सोइ तत्त सार नैन बिन देखा ॥*
*जोग न भोग, मोह नहिं माया,*
*दादू देख काल नहिं काया ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २४०)
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साभार ~ satsangosho.blogspot.com

वासनारहित पुरुष के अतिरिक्त दूसरा कौन है, जो जानता हुआ भी नहीं जानता है, देखता हुआ भी नहीं देखता है, और बोलता हुआ भी नहीं बोलता है।
ऐसा पुरुष जिसकी अब कोई वासना नहीं, जिसे पाने को कुछ शेष नहीं, जिसने भविष्य को त्याग दिया, अब जिसका कोई भविष्य नहीं, जो यहां और अभी परितृप्त, परितुष्ट, इस क्षण जिसका मोक्ष है, ऐसा जो वासनारहित पुरुष है, उसके अतिरिक्त दूसरा कौन है *जो जानता हुआ भी नहीं जानता*, और ऐसा पुरुष *देखता भी है और फिर भी देखता नहीं*, क्योंकि अब देखने की कोई वासना नहीं रही। *सुनता है और सुनता नहीं*। अब सुनने की कोई वासना नहीं रही। *छूता है और छूता नहीं*, क्योंकि छूने की अब वासना नहीं रही। एक सुंदर स्त्री आत्मवान के सामने से निकलेगी तो ऐसा थोड़े ही कि उन्हें दिखायी नहीं पडेगी? दिखायी पड़ती और नहीं दिखायी पड़ती। समझने योग्य श्लोक।
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हम अनेकों बार ऐसा करते हैं कि सुंदर स्त्री जाती है तो हम देखते ही नहीं उसकी तरफ। परन्तु हमारे न देखने में भी वह दिखायी पड़ती है। हम ऐसे आंख चुराते हैं कि कोई देख न ले कि इसे देख रहे थे। या हम अपने से ही बचना चाहते हैं, कि यह झंझट में न पड़े, इसे न देखें; हम इधर-उधर आख करते है, परन्तु इससे क्या भेद है, हमारी इधर-उधर होती आंख से भी हम देखते तो उसी को हैं। हमने देख तो लिया, हम देख तो रहे ही हैं।
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बुद्धपुरुष के सामने से कोई स्त्री निकलेगी तो देखते हैं, आख भी नहीं छिपाते, क्योंकि आख छिपाने का तो कोई प्रश्न नहीं, क्या चुराने का क्या सवाल है, जो आख के सामने आ जाता है दिखायी पड़ता है, और फिर भी नहीं देखते क्योंकि देखने की कोई वासना नहीं है।
बुद्धपुरुष लौटकर नहीं देखते। हम लौट लौटकर देखते हैँ। हम देखने में बड़े आतुर हैँ। बुद्धपुरुष की आंखें शून्यवत होती हैं। दर्पण की तरह होती हैं, कोई सामने आया तो तस्वीर बन जाती है, कोई चला गया तो तस्वीर मिट जाती है। फिर दर्पण सूना हो गया। कोई पकड़ नहीं है।
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*जानन्नपि न जानाति पश्यन्नपि न पश्यति।*
वासनारहित पुरुष के अतिरिक्त दूसरा कौन है, जो जानता हुआ भी नहीं जानता है, देखता हुआ भी नहीं देखता है और बोलता हुआ भी नहीं बोलता है।
*ब्रुवन्न् अपि न च ब्रूते कोऽन्यो निर्वासनादृते॥*
बोलकर भी नहीं बोलता है।
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नहीं बोलने की बात तो सच है, परन्तु इसको जड़ता से नहीं पकड़ा हमे कि मौन रहता है। फिर हम चूक गये। फिर हम पुरानी दुनिया में वापस आ गये, बोलने का मतलब बोलना और न बोलने का मतलब न बोलना। ऐसी परमदशा में विपरीत मिल जाते हैं। और विपरीत विपरीत नहीं रह जाते। बोलकर भी नहीं बोलता है। और कभी-कभी नहीं बोलकर भी बोलता है। कभी-कभी मौन से भी बोलता है। और कभी-कभी शब्द का उपयोग करके भी मौन रहता है। इस परम मुक्तावस्था में जो जो विपरीत है जगत में, जहां जहां द्वंद्व है, वह सब समाहित हो जाता है, शात हो जाता है।

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