मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019

= ८२ =


🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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८२ - विरह । शँखताल
पिव आव हमारे रे, 
मिल प्राण पियारे रे, बलि जाऊं तुम्हारे रे ॥टेक॥
सुन सखी सयानी रे, 
मैं सेव न जानी रे, हौं भई दिवानी रे ॥१॥
सुन सखी सहेली रे, 
क्यों रहूं अकेली रे, हौं खरी दूहेली रे ॥२॥
हौं करूँ पुकारा रे, 
सुन सिरजनहारा रे, दादू दास तुम्हारा रे ॥३॥
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८२ - ८५ में वियोग व्यथा दिखा रहे हैं, हे प्राण प्रिय स्वामिन् ! मेरे हृदय में आकर मुझसे मिलें, मैं आपकी बलिहारी जाती हूं । 
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हे ज्ञानी सन्त सखी ! मेरी बात ध्यान देकर सुन, मैं तो प्रभु के वियोग से पगली हो रही हूं, अत: मुझे उनकी सेवा - भक्ति करना भी नहीं आता । बता तो सही, कैसे उनकी उपासना की जाती है ? 
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हे साधक रूप सँगिनी सखी ! मेरी बात सुन तो सही, मैं प्रभु बिना अकेली कैसे रहूंगी ? प्रभु के बिना मैं अति दु:खी हूं । 
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सृकर्ता परमेश्वर ! मैं आपका दास हूं और बारँबार पुकार कर प्रार्थना कर रहा हूं । मेरी प्रार्थना सुनकर मुझे दर्शन देने की कृपा कीजिये ।
(क्रमशः)

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