गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

= ६४ =


🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
.
६४ - समता । वर्ण भिन्न ताल
तब हम एक भये रे भाई, 
मोहन मिलि सांची मति आई ॥टेक॥
पारस परस भये सुखदाई, 
तब दूतिया दूर्मति दूर गमाई ॥१॥
मलयागिरि मरम मिल पाया, 
तब बँस वरण कुल भरम गमाया ॥२॥
हरि जल नीर निकट जब आया, 
तब बूँद - बूँद मिल सहज समाया ॥३॥
नाना भेद भरम सब भागा, 
तब दादू एक रंगै रंग लागा ॥४॥
.
६४ - ६६ में समता दिखा रहे हैं - 
हे भाई ! विश्व - विमोहन प्रभु के मिलने पर जब हमारे में यथार्थ बुद्धि आयी तब हम प्रभु से एक हुये हैं । 
.
जब परमात्मा - पारस से जीव - लोह मिला, तब जो पहले व्यवहार रूप शस्त्रादि से सबको दु:खप्रद होता था, उसी दुर्बुद्धि जन्य द्वैत - भाव रूप काट को खोकर सबको सुखप्रद भक्त रूप सुवर्ण बना दिया । 
.
जब अन्त:करण रूप मलयागिरि में रहने वाले ब्रह्म - चँदन का रहस्य प्राप्त हुआ, तब जीव रूप वृक्ष अपना वँश, वर्ण, कुल आदि का भ्रम हृदय से दूर करके ब्रह्म रूप चँदन ही बन गया । 
.
जब हरि समुद्र - जल के पास उपासना द्वारा जीव - जल आया तब शरीरों में बिन्दु - बिन्दु रूप हुआ रहने पर भी अनायास अभेद ज्ञान होकर ब्रह्म - समुद्र - जल में समा गया । 
.
इस प्रकार जब ज्ञान द्वारा नाना प्रकार के सब भेद भ्रम हृदय से भाग जाते हैं, तब ब्रह्म रूप रँग राशि में अँश रूप जीव रँग अद्वैत रूप से मिल कर एक रँग हो जाता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें