मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*जीवित जगपति को मिलै, जीवित आत्मराम ।*
*जीवित दर्शन देखिये, दादू मन विश्राम ॥*
*क्षीर नीर ज्यूं मिल रहै, जल जलहि समान ।*
*आतम पाणी लौंण ज्यों, दूजा नांही आन ॥*
*मैं जन सेवक द्वै नहीं, मेरा विश्राम ।*
*मेरा जन मुझ सारिखा, दादू कहै राम ॥*
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com

*'मैं शुद्ध बोध हूं मुझसे अज्ञान के कारण उपाधि की कल्पना की गई है। इस प्रकार नित्य विचार करते हुए मैं निर्विकल्प में स्थित हूं।'* संस्कृत में जो शब्द है 'विमर्श', उसका ठीक अर्थ विचार नहीं होता। मैं केवल बोध—मात्र हूं होश—मात्र हूं ; होश मेरा स्वभाव है। शेष सब स्वप्नवत है। और सब मेरी कल्पना के कारण पैदा हुआ है। 'विमर्श' शब्द समझने जैसा है। अंग्रेजी में एक शब्द है 'रिफ्लेक्सन', वह ठीक अर्थ है विमर्श का। विचार का तो अर्थ होता है, तुम्हें पता नहीं, और तुम सोचते हो।
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तुम कहते हो, हम विचार करते हैं। विमर्श का अर्थ होता है, जैसे दर्पण में प्रतिबिंब बनता है। दर्पण सोचता थोड़े ही है ! जब कोई सामने आये, तो सोचता थोड़े ही है, कि देखें कौन है, आदमी है कि औरत? सुंदर है कि असुंदर? फिर वैसा ही रूप बता दें। न, प्रतिबिम्ब दर्पण में सिर्फ प्रगट होता है, छवि बन जाती है। रिफ्लेक्शन, विमर्श ! इस प्रकार नित्य विमर्श करते हुए, इस प्रकार नित्य क्षण— क्षण इस शाश्वत एकता को देखते हुए, यह हृदय के दर्पण में बनते प्रतिबिंब को निहारते हुए, मैं निर्विकल्प चित्त—दशा में स्थित हूं। शुद्ध बोध हूं।
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जो हुआ, सब मेरी कल्पना से हुआ। जो हुआ, सब मेरी कल्पना का खेल है। कल्पना मनुष्य की शक्ति है। भारत के शास्त्र कहते हैं कि कल्पना परमात्मा की शक्ति है। कल्पना का ही दूसरा नाम माया। माया अर्थात परमात्मा ने कल्पना की है। परमात्मा की ही कल्पना का परिणाम है यह विराट विश्व। और आदमी जो कल्पना करता है, उसका परिणाम है हम सबकी छोटी—छोटी दुनियाए। हर आदमी अपनी—अपनी दुनिया में रहता है—अपनी—अपनी दुनिया में बंद।
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कोई ऐसा न सोचे कि हम सब एक ही दुनिया में रहते हैं ! जितने आदमी हैं यहां, उतनी दुनियाएं एक साथ। इसलिए तो दो आदमी मिलते हैं, तो टकराहट होती है। दो दुनियाएं टक्कर खाती हैं। कठिन हो जाता है। अकेले—अकेले सब ठीक चलता है, दूसरे के साथ जुड़े कि अड़चन हुई। क्योंकि दो दुनियाए, दो ढंग, दो विचार की शैलियां, एक—दूसरे के साथ संघर्ष करने लगती हैं। हमारी कल्पना ही हमारी दुनिया बन जाती है। कल्पना की शक्ति बड़ी है। कल्पना का अर्थ है, जो हम सोचते हैं, वैसा होने लगता है।
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जीवन को सहज स्वीकार करे मनुष्य ! जीवन जैसा है, उससे अन्यथा होने की चेष्टा न करे; जीवन जैसा है ऐसा ही परमात्मा ने चाहा है। मनुष्य इस चाह में स्वयं को विसर्जित कर दे कि परमात्मा तेरी मर्जी पूरी हो।मनुष्य अपनी इच्छा को बीच में न लाये। मनुष्य स्वीकार कर ले कि परमात्मा जैसा चलाएगा, चलेंगे; जो दिखायेगा, देखेंगे; जहाँ पहुंचाएगा, पहुंचेंगे। डुबोयेगा मझधार में तो वो ही हमारा किनारा-अब सब परमात्मा पर छोड़ते हैं। समर्पण की ये स्थिति मनुष्य को निर्भार कर देगी।
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इसे ही चैतन्य में विश्राम, चित्त की आंतरिक स्थिति में विश्राम कहते हैं। फिर कहीं जाना नहीं, कुछ होना नहीं; कुछ बनना नहीं। ये सब अहंकार के ही खेल हैं। मनुष्य कहता है : ये बन कर रहूंगा..........। किसी को सम्राट बनना है, किसी को कुछ और; किसी को कुछ और-बनने का पागलपन सभी को है। मनुष्य है ही और इससे बेहतर कुछ और हो नहीं सकता। पूर्ण मनुष्य है, पूर्ण होना मनुष्य का स्वभाव है। *मनुष्य निरंजन है, उसके अशुद्ध होने का कोई उपाय नहीं है। इस सत्य में स्वयं को समर्पित करते ही क्षण भर में क्रांति घटित हो जाती है।*
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*'दुःख का मूल द्वैत है। उसकी कोई औषधि नहीं है। ये सब दृश्य झूठ है।मैं एक अद्वैत शुद्ध चैतन्य हूं।'* सब कुछ उस परम और विराट की तरंगे मात्र ही है। फिर जाना कहां? फिर होना क्या? फिर न कोई भविष्य है, न कोई लक्ष्य; न जीवन में कोई प्रयोजन है। मनुष्य इस जीवन धारा में स्वयं को छोड़ दे। ये जीवन धारा उस परमात्म-सागर में ही जा रही है।

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