#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
.
*= फुटकर काव्य १.चौबोला - २ =*
.
*बहे राबरे कौंन दिशि आव राषि मन मोर ।*
*हररैं हररैं जिनि फिरहु करहु कृपा की कोर ॥२॥*
२. बहे रावरे – यह छन्द भी द्वयर्थक है । प्रथम पंक्ति में *बहे राव रे कौन दिशि* प्रथम अर्थ – बहेड़ा का वृक्ष किस दिशा(स्थान) में(कहाँ) उत्पन्न होता है ? दूसरा अर्थ है –आपके हाथी घोड़े अब कहाँ चले गये ?
*आव राखि मन मोर* का अर्थ है – हे मेरे मन ! अपनी कुशलता बनाये रख । द्वितीय अर्थ है – इधर-उधर घूमना छोड़कर मेरी रक्षा करो । अर्थात परदेश में घूमना छोड़कर मेरी सम्हाल करो । उसी बात को कवि तृतीय, चतुर्थ पद में स्पष्ट करते हैं – इधर उधर बहके बहके न फिरे; अपितु अपने पर कृपा करते हुए स्वयं पर निग्रह करो ॥
आध्यात्मिक पक्ष में, इन दोनों छन्दों का ब्रह्म से सम्बद्ध अर्थ स्पष्ट ही है, क्योंकि भगवान् की भक्ति के बिना या आत्मध्यान के बिना मन को अतिशय, क्लेश सहन करने पड़ते हैं ।
तृतीय पद में *हर्रे* आयुर्वेदशास्त्र में प्रसिद्ध त्रिफला(हर्रे, बहेड़ा, आँवला) की तीन औषधियों में से एक औषध । यहाँ त्रिफला शब्द त्रिगुण(सत्त्व, रज, तम) से है ।
कवि द्वारा यह प्रार्थना त्रिगुण के चक्र में न फँस कर मन को परमात्मतत्त्व में लय हेतु प्रार्थना है कि मुझ पर ऐसी कृपा करो कि मेरा चित्त विषयभोगों में आसक्त न हो ॥२॥
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
.
*= फुटकर काव्य १.चौबोला - २ =*
.
*बहे राबरे कौंन दिशि आव राषि मन मोर ।*
*हररैं हररैं जिनि फिरहु करहु कृपा की कोर ॥२॥*
२. बहे रावरे – यह छन्द भी द्वयर्थक है । प्रथम पंक्ति में *बहे राव रे कौन दिशि* प्रथम अर्थ – बहेड़ा का वृक्ष किस दिशा(स्थान) में(कहाँ) उत्पन्न होता है ? दूसरा अर्थ है –आपके हाथी घोड़े अब कहाँ चले गये ?
*आव राखि मन मोर* का अर्थ है – हे मेरे मन ! अपनी कुशलता बनाये रख । द्वितीय अर्थ है – इधर-उधर घूमना छोड़कर मेरी रक्षा करो । अर्थात परदेश में घूमना छोड़कर मेरी सम्हाल करो । उसी बात को कवि तृतीय, चतुर्थ पद में स्पष्ट करते हैं – इधर उधर बहके बहके न फिरे; अपितु अपने पर कृपा करते हुए स्वयं पर निग्रह करो ॥
आध्यात्मिक पक्ष में, इन दोनों छन्दों का ब्रह्म से सम्बद्ध अर्थ स्पष्ट ही है, क्योंकि भगवान् की भक्ति के बिना या आत्मध्यान के बिना मन को अतिशय, क्लेश सहन करने पड़ते हैं ।
तृतीय पद में *हर्रे* आयुर्वेदशास्त्र में प्रसिद्ध त्रिफला(हर्रे, बहेड़ा, आँवला) की तीन औषधियों में से एक औषध । यहाँ त्रिफला शब्द त्रिगुण(सत्त्व, रज, तम) से है ।
कवि द्वारा यह प्रार्थना त्रिगुण के चक्र में न फँस कर मन को परमात्मतत्त्व में लय हेतु प्रार्थना है कि मुझ पर ऐसी कृपा करो कि मेरा चित्त विषयभोगों में आसक्त न हो ॥२॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें