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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार ~ महामंडलेश्वर स्वामी अर्जुनदास जी महाराज,श्री दादूद्वारा बगड,झुंझुनू ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*दादू काढे काल मुखि, श्रवणहुँ सबद सुनाइ ।*
*दादू ऐसा गुरु मिल्या, मृतक लिये जिलाइ ॥१४॥*
क्रोध भी महाकाल है । इसकी उत्पत्ति काम से ही होती है । गीता में कहा है कि रजोगुण से पैदा होने वाला काम ही किसी कारण से प्रतिहत होने पर क्रोध बन जाता है और यह क्रोध नरक का द्वार है । मनुष्यों को मारने वाला परम शत्रु है । अतः इसे सर्वथा हेय ही माना गया है । गीता में भी क्रोध को नरक का द्वार तथा आतमा का नाशक बताते हुए इसे सदा हेय ही कहा है । इस प्रकार सद्गुरु क्रोध के दोषों को बता कर क्षमा के उपदेश से क्रोध से मृततुल्य पुरुषों में पुनः जीवन डाल देते हैं ॥१४॥
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*दादू काढे काल मुखि, गूंगे लिये बुलाइ ।*
*दादू ऐसा गुरु मिल्या, सुख में रहे समाइ ॥१५॥*
लोभ भी काल है । लोभ किसी का भी पूरा नहीं होता । ज्यों ज्यों लाभ होता है त्यों त्यों लोभ दुगुना बढ़ता जाता है । लोभी को कहीं शान्ति नहीं मिलती । अतः लोभ को सर्वविध अनर्थों का मूल एवं दुःखप्रद जान कर संतोषवृत्ति से उसको त्याग देना चाहिये क्योंकि लोभी आदमी बधिर तथा गूंगा हो जाता है । वह किसी गरीब की कोई भी बात नहीं सुनता । अतः सद्गुरु ही लोभ के दोषों को बताकर, सन्तोषवृत्ति से रहना सिखा कर शिष्य को लोभ के जंजाल से निकाल कर परम सुखी बना देते हैं ॥१५॥
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*दादू काढे काल मुख, मिहर दया करि आइ ।*
*दादू ऐसा गुरु मिल्या, महिमा कही न जाइ ॥१६॥*
मोह भी काल है; क्योंकि महाभारत में लिखा है कि- हे राजन् ‘मम’ ये दो अक्षर मृत्युरूप हैं और ‘न मम’ ये तीन अक्षर शाश्वत ब्रह्म रूप हैं । इस प्रकार इस शरीर में ये दोनों अदृश्य होकर लड़ रहे हैं । अतः मोह को भी काल ही समझना चाहिये । मोहाविष्ट प्राणी संसार में जन्म-मृत्यु के चक्र में भ्रमतः रहता है । मोह सब प्राणियों को ग्राह की तरह पकड़ता है । अतः सद्गुरु कृपा करके मोहग्रस्त प्राणियों का ज्ञान के उपदेश द्वारा उद्धार करते हैं । इसलिये सद्गुरु की महिमा कैसे वर्णन की जा सकती है ॥१६॥
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*सतगुरु काढे केस गहि, डूबत इहि संसार ।*
*दादू नाव चढाइ करि, कीये पैली पार ॥१७॥*
यहाँ केश शब्द से अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश रूप पाँच क्लेशों का ग्रहण करना चाहिये । केश शब्द क्लेश का ही अपभ्रंश है । अविद्या अनादि तथा भावरुपा है । ज्ञान से उसकी निवृत्ति होती है । वह क्षणभंगुर तथा संसार की कारण है । वेदान्तशास्त्रों में उसको अविद्या, माया, प्रकृति आदि शब्दों से व्यवहृत किया गया है ।
अहंकार धर्मी के अध्यास को ‘अस्मिता’ कहते हैं । सुखानुशायी राग होता है । अर्थात् मोह से अनुभव किया जा रहा जो सुख है उसकी राजसी वृत्तिविशेष को ‘राग’ कहते हैं । ‘सभी सुख मेरे को प्राप्त हों’ यह उसका स्वरूप है । दृष्टादृष्ट सामग्री के अभाव से ऐसा होना असम्भव है ।
अतः राग चित्त को कलुषित करता है । दुःखानुशायी द्वेष होता है । यह भी तमोगुणसहित रजोगुण का परिणाम है ।
‘ऐसा दुःख कभी भी मुझे न हो’-ऐसा उसका स्वरूप है । शत्रु, व्याघ्र आदि दुःख साधनों के रहते हुए उनका निवारण असम्भव है । इस तरह राग की तरह द्वेष भी चित्त को मलिन करता है ।
‘मेरे को ही सब सुख प्राप्त हो, अन्य किसी को भी नहीं’-ऐसी वृत्ति को अभिनिवेश कहते हैं ।
ये पाँचों क्लेश अविद्यामूलक होने से ‘आविद्यक’ कहलाते हैं । ये आविद्यक होने से रज्जुसर्पवत् मिथ्या है तथा नाशवान् हैं । फिर भी दुःख देते हैं । अतः विद्वान् इन को ज्ञान से मिथ्या मानकर कभी इनमें नहीं रमता है; क्योंकि क्लेशों की परम्परा घटीयन्त्र(अरहट) की तरह दिन रात चलती रहती है । इस प्रकार सद्गुरु शिष्य को पंच क्लेशों के दुःख को बताते हुए संसार में सुख की कहीं गन्ध भी नहीं है’- ऐसी ज्ञानरुपी नौका से संसारसागर से पार कर देते हैं, और वह सब जगह हमेशा ज्ञान को दृढ़ करता रहता है ।
गीता में भी लिखा है कि हे अर्जुन ! इन्द्रियजन्य भोग सुख-दुःख के देने वाले नाशवान् है । अतः विद्वान् इनमें कभी अनुरक्त नहीं होता ।
विष्णुपुराण में भी लिखा है कि मनुष्य अपने जीवन में जितने भी मन को प्रिय लगने वाले सम्बन्धों को बढ़ाता है, उतने ही अपने हृदय में शोक के खूंटे गाड़ रहा है ॥१७॥
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*भौ सागर में डूबतां, सतगुरु काढे आय ।*
*दादू खेवट गुरु मिल्या, लीये नाव चढाइ ॥१८॥*
प्रश्न है कि यह समग्र संसारसागर क्या है, जिसमें सभी प्राणी डूबे हुए हैं? उसी को बता रहे हैं- यह सारा संसार अनादि अविद्या के कारण मोहनिशा में सोता हुआ दिनरात सुख-दुःख स्वप्न भ्रम की परम्परा से व्याप्त है । जन्म-मरण भय हर्ष क्रोध शोक से युक्त काम-क्रोध रूपी व्याघ्रों से पीड़ित स्त्री, पुत्र, मित्र आदि सम्बन्धी वर्ग से दुःखी है । भोग और ऐश्वर्य में प्रसक्त है । ऐसे संसार में विषयजल में डूबते हुए प्राणी को सद्गुरु कृपापूर्वक “यह संसार असार दुःखरूपी मोह को पैदा करने वाला है । इसमें न कोई किसी का पुत्र है, न किसी का कोई धन है । स्नेह करने वाला इस में जलता रहता है”-ऐसा ज्ञान देकर स्वयं कर्णधार बन कर संसार से पार कर देते हैं ॥१८॥
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*दादू उस गुरुदेव की, मैं बलिहारी जाऊँ ।*
*जहाँ आसण अमर अलेख था, ले राखे उस ठाऊँ ॥१९॥*
जिस गुरु ने ब्रह्मज्ञान के द्वारा संसार की असारता को बतलाकर मुझे ब्रह्मनिष्ठ बनाया और अजर-अमर भाव को प्राप्त करा दिया, उस गुरु के गुणों को बार बार स्मरण करता हुआ उनके चरण कमलों में मैं सदा नतमस्तक हूँ ॥१९॥
(क्रमशः)

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