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*दादू सेवग सेवा कर डरै, हम थैं कछु न होइ ।*
*तूँ है तैसी बन्दगी, कर नहिं जाणै कोइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*उनमानी का अंग ८७*
इस अंग में शक्ति अनुसार भक्ति आदि कार्य करने की प्रेरणा कर रहे हैं ~
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रज्जब कीजे बंदगी, जेती जीवतें होय ।
जो साहिब सौंपी नहीं, तासौं बल नहिं कोय ॥१॥
जीव से जितनी भक्ति हो सके उतनी अवश्य करनी चाहिये, उससे अधिक करने की जो शक्ति है, वह प्रभु ने नहीं दी है, तब उसके करने के लिये जीव पर कोई प्रकार भी बल का प्रयोग हीं किया जाता ।
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रज्जब राखहु बंदगी, जे लघु दीरघ होय ।
ज्यों कर अंगुली हालतां, दाग१ न देवै कोय ॥२॥
लघु वा दीर्ध जो भी हो सके वह प्रभु की भक्ति हृदय में अवश्य रखनी चाहिये । जैसे हाथ की अँगुली भी हिलती है तो भी शरीर को नहीं जलाया१ जाता, वैसे ही किचिंत भगवद् भक्ति हो तो भी प्राणी कष्ट से मुक्त हो जाता है ।
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सौ कोसाँ सांतल१ चलै, लहै मौज२ साबास३ ।
लरिकहुं लौन उतारिये, ऊभौ४ होत उल्लास५ ॥३॥
बड़ा मनुष्य अपनी जंधाओं१ से सौ कोस चले तो भी प्रशंसा३ का आनन्द२ प्राप्त करता है, और गोद का शिशु हर्ष५ की अमंग में खड़ा४ हो जाय तो भी उस पर दृष्टि दोष दूर करने के लिये लौन उतारते हैं । कारण बड़े की तो सौं कौस चलने की शक्ति है और शिशु की खड़े होने की भी नहीं है, अत: शक्ति के अनुसार ही साधन करना चाहिये ।
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रज्जब अजरी१ अनल का, एक उडाण न होय ।
त्यों सुकृत सुमिरण सबै२, वित३ उनमान सु जोय ॥४॥
मक्खी१ और अनल पक्षी की उड़ान एक सी नहीं होती, वैसे ही देखो, प्राणियों में हरि-स्मरण आदि सभी२ पुण्य कर्म अपनी धन३ आदि शक्ति के समान ही होते हैं ।
(क्रमशः)

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