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*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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७० - पँजाबी त्रिताल
ऐसा ज्ञान कथो मन ज्ञानी,
इहिं घर होइ सहज सुख जानी ॥टेक॥
गँग जमुन तहं नीर नहाइ,
सुषमन नारी रँग लगाइ ॥१॥
आप तेज तन रह्यौ समाइ,
मैं बलि ताकी देखूँ अघाइ ॥२॥
बास निरँतर सो समझाइ,
बिन नैनहुं देखूं तहं जाइ ॥३॥
दादू रे यहु अगम अपार,
सो धन मेरे अधर अधार ॥४॥
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हे ज्ञानी नर ! हमारे आगे तो ऐसा ज्ञान कथन करो, जिससे हम ज्ञानी होकर, इस शरीर रूप घर में ही सहज स्वरूप ब्रह्म को जान कर सुखी हो जावें ।
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पिंगला नाड़ी रूप गँगा, इड़ा रूप यमुना, इनके प्राणायाम - प्रवाह में स्नान करके पवित्र होऊं और सुषुम्ना नाड़ी द्वारा ध्यान रूप रँग लगाऊं,
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फिर ध्यान द्वारा जो अपना आत्म स्वरूप प्रकाश शरीर में समा रहा है, उसे तृप्त होकर देखूँ और उसकी बलिहारी जाऊं ।
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जिसमें हम निरँतर बस रहे हैं वो जिसका हमारे में निरँतर निवास है, उसी को इस प्रकार समझाओ कि विचार द्वारा उसके स्वरूप के समीप जाकर बाह्य नेत्रों के बिना ही प्राणी उसका साक्षात्कार कर सके ।
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अरे भाई ! यह जो अगम अपार ब्रह्म तत्व है, सोई हमारा धन और निरालँब का आधार है ।
(क्रमशः)

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