🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*बहुत पसारा कर गया, कुछ हाथ न आया ।*
*दादू हरि की भक्ति बिन, प्राणी पछताया ॥*
======================
*सिर्फ एक राम नाम सत्य है*
*"सत्यराम"*
🙏 लोग भी जब मर जाते हैं, जब अर्थी उठती है तो मालूम है हम क्या कहते हैं? रामनाम सत्त है।
.
हर अर्थी के साथ हम कहते हैं: रामनाम सत्य है, सत्त बोले गत्त है। जिंदगी भर राम को याद न किया, मुर्दा लाश के चारों तरफ हम दोहराते हैं: रामनाम सत्त है। बड़ी देर हो गई, जरा पहले दोहराना था ! मैं तो तुमसे कहूंगा, जिनसे तुम्हें प्रेम हो उनको पकड़ लो, बांध दो अर्थी में, ले चलो: रामनाम सत्त है ! जिंदगी में कुछ कहो, तो सुनें तो कुछ अकल आए ! अब मर गए, अब न उन्हें सुनाई पड़ता है, अब तुम चिल्ला रहे हो: रामनाम सत्त है !
.
और ध्यान रखना, तुम मुर्दों के लिए तो रामनाम सत्त कह रहे हो और कह रहे हो: सत बोले गत्त है, कि सत्य बोलो तो गति हो जाती है, अपने बाबत क्या खयाल है? वह तुम दूसरों पर छोड़ रहे हो, कि भई, जैसे हमने तुम्हारी लाश पर बोला रामनाम सत्य है, जब हम मरें, तुम भी बोल देना। एक औपचारिकता निभा रहे हो !
.
मरघट पर लोग जाकर गपशप करते हैं बाजार की...कौन—सी फिल्म अच्छी लगी है गांव में? न—मालूम कहां—कहां की फिजूल बातें करते हैं।... जरा मरघट पर जाया करें ! जब अर्थी ले जाते हैं तो रामनाम सत्त है ! अर्थी पहुंचा कर, अर्थी को रखा चिता पर, फिर अर्थी की तरफ पीठ करके जरा लोगों की बातें सुनो ! क्या—क्या गजब की बातें लोग कर रहे हैं !
.
मैंने तो अपने गांव में ऐसे लोग भी देखे हैं की उधर लाश जल रही है और वे जुआ खेल रहे हैं। मरघट पर ! मरघट पर जुआ खेलने की सुविधा है, पुलिस को भी पता नहीं चलता कि वहां जुआ चल रहा है। और फिर बैठे—बैठे करें भी क्या? अब ये सज्जन तो जलने में वक्त लेंगे। तीन—चार घंटे लगें, कि छह घंटे लगें। और अगर लकड़ियां गीली हों और वर्षा का मौसम हो तो पता नहीं दिन भर खराब होने वाला है ! तो लोग ताश ले जाते हैं साथ कि वहीं बैठ कर ताश जमा देंगे ! कैसी अदभुत दुनिया है, कोई मर गया और तुम्हें अभी भी ताश खेलने की पड़ी है !
.
लेकिन मैं समझता हूं, इसके पीछे मनोवैज्ञानिक कारण हैं।
ये बचने के उपाय हैं। इस तरह अपने मन को इस सत्य से बचाना है कि मौत है, कि मौत आती है। इसकी आई, कल अपनी भी आती होगी। इसको झुठलाना है। और कोई मरते हैं; यह मरने का धंधा हमेशा दूसरे करते हैं, अपने को थोड़े ही मरना है ! मैं नहीं मरूंगा, ऐसा हम अपने भीतर भाव रखते हैं। कहें, चाहे न कहें।
.
अरे हां, पलटू रामनाम है सार संदेसा कहि गए॥
जो जनमा सो मुआ नाहीं थिर कोई है।
जो जन्मा, वह मरेगा, कोई भी बचने वाला नहीं है। जन्म के साथ ही मृत्यु भी आ गई।
राजा रंक फकीर गुजर दिन दोई है॥
फिर चाहे अमीर हो, चाहे गरीब, दो दिन की जिंदगी है ! ऐसे गुजारो कि वैसे, सुविधा में कि असुविधा में, झोपड़ों में कि महल में, कुछ बहुत फर्क नहीं पड़ता।
.
चलती चक्की बीच परा जो जाइकै।
यह जो जन्म—मृत्यु की चक्की है, इसके बीच में जो भी पड़ गया है...
अरे हां, पलटू साबित बचा न कोय गया अलगाइकै।
उसे काल का ग्रास हो ही जाना पड़ा है। मृत्यु अवश्यंभावी है।
.
जिसको इस सत्य की गहरी प्रतीति होने लगती है कि मृत्यु अवश्यंभावी है, वह धार्मिक हुए बिना नहीं रह सकता। क्योंकि मृत्यु से बचने का एक ही उपाय है, वह धर्म है। मृत्यु के सागर के पार ले जाने वाली एक ही नौका है, वह धर्म है। मृत्यु के पार आंखों को अमृत का दर्शन करा देने वाला अगर कोई भी द्वार है तो वह धर्म है। पलटू की बात पर ध्यान करना। यहां खूब जिंदगी सुहानी है, प्यारी है, मगर रुक मत जाना........😍
❣ _*ओशो*_ ❣
🌹 *सपना यह संसार--(प्रवचन--15)* 🌹

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें