शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019

= *निष्पक्ष मध्य का अंग ८८(१७/२०)* =

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*दादू पख काहू के ना मिले, निर्पख निर्मल नांव ।*
*सांई सौं सन्मुख सदा, मुक्ता सब ही ठांव ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*निष्पक्ष मध्य का अंग ८८*
माया बिन मर जाइये, माया पायों मीच । 
जन रज्जब जीवत मतै१, विदु२ जन बैठै बीच ॥१७॥ 
माया बिना भी प्राणी मरते हैं और माया प्राप्त करने पर भी मृत्यु होती है, इसलिये विद्वान२ संत जन माया संग्रह और त्याग इन दोनों पक्षों के बीच में स्थित रहने के सिद्धान्त१ द्वारा जीवन धारण करते हैं । 
देही दीपक ज्योति जप, युक्ति मध्य ठहराय । 
शक्ति समीर सु बहु बिना, जन रज्जब बुझ जाय ॥१८॥ 
दीपक को युक्ति से ऐसे स्थान में रक्खा जाता है, जहाँ वायु अधिक भी न हो और सर्वथा बंद भी न हो, अधिक होने से तथा डब्बे में बंद करने से दीपक ज्योति बुझ जाती है, वैसे ही देह में जप को युक्ति से रखना चाहिये । बहुत माया होने से उसकी रक्षा की चिन्ता द्वारा और सर्वथा न होने से खान-पानादि के अभाव की चिन्ता द्वारा जप छूट जायगा, अत: साधक को मध्य की स्थिति में ही रहना चाहिये । 
शक्ति सुता तो बहिन है, श्रीपति पत्नि मात । 
तासौं रंग न रूठना, रिधि१ सौं कैसी घात२ ॥१९॥ 
माया की पुत्री रूप नारियाँ तो सभी बहिना हैं और भगवान की पत्नि लक्ष्मी माता हैं, अत: उनसे प्रेम करना है, और न रुष्ट होना है, तब माया१ की बुराई२ कैसे की जा सकती ? संत तो निष्पक्ष ही रहते हैं । 
रज्जब साबुन सलिल का, सुनहु सनेही हेत । 
देखहु हिन्दू तुरक के, वसतर करहिं सु सेत ॥२०॥ 
प्रभु - प्रेमीजनों ! साबुन और जल का निष्पक्ष प्रेम सुनो और देखे, ये दोनों ही हिन्दू और मुसलमान दोनों के ही वस्त्रों का मैल निकाल कर उन्हें श्वेत कर देते हैं, वैसे ही संत निष्पक्ष रहते हुये उपदेश द्वारा सभी को निष्पक्ष करते रहते हैं । 
(क्रमशः)

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