#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= फुटकर काव्य २.गूढार्थ - १५/१६ =*
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*रसु सोई अमृत पिवै रन सोई जिह ज्ञांन ।*
*शुप सोई जौ बुद्धि बिन तीनों उलटे जांन ॥१५॥*
१.‘देवता’(सुर) उसे ही कहते हैं जिसने अमृतपान किया हो ।
२. मनुष्य(नर) जिसे आत्मज्ञान है ।
३. ‘पशु’ वही है जो बुद्धिहीन है ।
ये तीनों अर्थ ‘रसु’, ‘रन’ एवं ‘शुप’ से निकलते हैं ॥१५॥
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*तारी बाजै कुंभ ज्यौं षैरा गर्व गुमांन ।*
*लैबौ मिथ्या राति दिन लाभ न होई निदांन ॥१६॥*
इसी प्रकार, घट ध्वनि के समान गम्भीर ‘ताली’ बजती है । गर्व एवं गुमान(अभिमान) रखा जाता है । लोक में निश्चित ही मिथ्यावाग् व्यवहार से हित(भला) नहीं होता ॥१६॥
यहाँ ‘ताली’, ‘राखै’, ‘बोलै’ एवं ‘भला’ – इन चार शब्दों से उक्त अर्थ निकले हैं ॥
(क्रमशः)

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