रविवार, 20 अक्टूबर 2019

= सुन्दर पदावली(फुटकर काव्य २.गूढार्थ - १५/१६) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= फुटकर काव्य २.गूढार्थ - १५/१६ =* 
*रसु सोई अमृत पिवै रन सोई जिह ज्ञांन ।* 
*शुप सोई जौ बुद्धि बिन तीनों उलटे जांन ॥१५॥* 
१.‘देवता’(सुर) उसे ही कहते हैं जिसने अमृतपान किया हो । 
२. मनुष्य(नर) जिसे आत्मज्ञान है । 
३. ‘पशु’ वही है जो बुद्धिहीन है । 
ये तीनों अर्थ ‘रसु’, ‘रन’ एवं ‘शुप’ से निकलते हैं ॥१५॥ 
*तारी बाजै कुंभ ज्यौं षैरा गर्व गुमांन ।* 
*लैबौ मिथ्या राति दिन लाभ न होई निदांन ॥१६॥* 
इसी प्रकार, घट ध्वनि के समान गम्भीर ‘ताली’ बजती है । गर्व एवं गुमान(अभिमान) रखा जाता है । लोक में निश्चित ही मिथ्यावाग् व्यवहार से हित(भला) नहीं होता ॥१६॥ 
यहाँ ‘ताली’, ‘राखै’, ‘बोलै’ एवं ‘भला’ – इन चार शब्दों से उक्त अर्थ निकले हैं ॥ 
(क्रमशः)

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