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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*अर्थ आया तब जानिये, जब अनर्थ छूटे ।*
*दादू भाँडा भरम का, गिरि चौड़े फूटे ॥*
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साभार ~ oshostsang.wordpress.com
*आत्मज्ञान कैसे हो?*
कैसे कहा कि चूक गए? अनुष्ठान ! फिर इन सूत्रों को समझ ही न सका। कैसे यानि अनुष्ठान ! कैसे अर्थात किस विधि से? कैसे की अगर चाह है तो फिर योग है मार्ग, योग में बहुत से उपाय हैं - यम, नियम, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान फिर समाधि।
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लेकिन ये मार्ग लंबा है। यदि कैसे की ही जिद है तो फिर ये ही है मार्ग, और फिर इस मार्ग की भी कठिनाइयां है। अधिक लोग तो यम ही साधते रह जाते हैं,नियम तक पहुंच ही नहीं पाते। कुछ जो नियम तक पहुंच जाते हैं, वे फिर आसन में अटक जाते हैं। बहुत अधिक श्रम करने वाले ज्यादा से ज्यादा धारणा तक पहुंच पाते हैं। और घटना घटित होती है समाधि में, फिर समाधि को भी बांट दिया गया है।
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और ध्यान रहे इतनी लम्बी यात्रा के बाद अंत में निष्पत्ति योग की भी ये ही है कि अब सब छोड़ो। लेकिन अधिक तो ऐसे ही हैं, जो किये बिना छोड़ ही नहीं सकते।
जैसे छोटा बच्चा है, ऊधम मचाता है; शोरगुल करता है, बैठने को कहा जाए तो बैठ नहीं सकता। वो कुछ करना चाहता है क्योंकि भीतर ऊर्जा का अतिरेक है। उसको बैठाने के लिए उपाय करना पड़ेगा। उससे कहा जाए कि जाओ जरा दौड़ कर आओ। फिर वह दौड़-२ कर खुद ही थक कर बैठ जाएगा। फिर उसे ये नहीं कहना पड़ेगा कि शांत हो जाओ। वह स्वयं ही शांत होकर बैठ जाएगा।
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योग का मार्ग उनके लिए ही है जो सीधे शांत होकर नहीं बैठ सकते। ऐसा करो, वैसा करो; योग का मार्ग मनुष्य को करने से थका डालता है और फिर कहता है कि अब सब छोड़ दो। मनुष्य करना चाहता है क्योंकि मनुष्य के तर्क में ये बैठता ही नहीं कि बिना किये भी सब हो सकता है।
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*सूत्र कहता है कि तुम मुक्त हो ! लेकिन मनुष्य तर्क बिठाता है कि मैं इस 'मैं' से कैसे मुक्त हो जाऊं। कैसे का प्रश्न ही तभी उठता है, जब कोई ये मान ले कि मैं मुक्त नहीं हूं। पहले ही ये मान लिया कि मैं बन्धन में हूं और कैसे मुक्त हो जाऊं? बंधन है ही नहीं। बंधन में हूं, ये भ्रान्ति ही बन्धन का कारण हैं। मनुष्य फिर प्रश्न करेगा कि इस भ्रान्ति से कैसे मुक्त हुआ जाए? तब पूरी समस्या को ही मनुष्य चूक रहा है, क्योंकि भ्रान्ति का अर्थ ही है कि नहीं है; मुक्त क्या होना? देखते ही, जागते ही - मुक्त है।*
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*तरकीबों में पड़ने से मुश्किल और बढ़ जायेगी। तब एक जीवन ही क्या, अनेकों जीवन कम पड़ जाएंगे। मनुष्य कितने-२ जन्मों से तो तरकीबें साधता रहा है ! और करने से मनुष्य को भरोसा आता है क्योंकि करना अहंकार को भरता है। ये सूत्र कहते हैं कि कुछ करो ही मत क्योंकि करने वाला एक वो परमात्मा ही है। जो हो रहा है - हो रहा है, मनुष्य उसमे केवल सम्मिलित हो जाए। मनुष्य इतना भी प्रश्न न उठाये कि इस मैं से कैसे मुक्ति मिले?*
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यदि मैं का जन्म हो ही गया है, मनुष्य है ही कौन; जो इससे मुक्त होने का भी प्रयास करे? इसे भी मनुष्य स्वीकार कर ले कि ठीक ! यदि ये हो रहा है तो हो रहा है, मनुष्य ने तो इस मैं को निर्मित किया नहीं है। मनुष्य ने कब बनाया इसे? और जिसे मनुष्य ने निर्मित किया नहीं, उससे मनुष्य छूटेगा कैसे? जैसे ये शरीर मिला है, वैसे ही अहंकार भी मिला है; ये सब मिला है। तो जो भी है ठीक है। मनुष्य रंचमात्र भी शिकायत न रखे। तब इस परम स्वीकार में, मनुष्य अचानक पायेगा कि मैं विलीन हो गया। क्योंकि मैं का जन्म ही कर्ता के कारण होता है, मनुष्य जब कुछ करता है, तब मैं बनता है।
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*मनुष्य जब मैं को मिटाने का प्रयास करता है, तब ये जो मिटाने वाला है; वो मैं निर्मित कर लेता है। किसी भी तरह से मनुष्य मैं से बच न सकेगा? वस्त्र बदल लिए लेकिन मनुष्य वही का वही रहता है। अहंकार से मुक्त होने के लिए मनुष्य जल्दी न करे, मैं को समझने के लिए थोड़ा विश्राम करे मनुष्य और ध्यान दे कि मैं निर्मित कैसे होता है? करने से मैं निर्मित होता है, चेष्टा से निर्मित होता है, यत्न से निर्मित होता है, सफलता से निर्मित होता है। मनुष्य जहाँ भी यत्न करेगा, वहीं बन जाएगा।
इसलिए अहंकार से यदि मुक्त होना है, तो मनुष्य प्रयास न करे, यत्न न करे; जो भी जैसा है उसे मनुष्य वैसा ही स्वीकार कर ले। इस स्वीकरण में ही मनुष्य पायेगा, अहंकार ऐसे मिट गया; जैसे था ही नहीं। क्योंकि उसको ऊर्जा देने वाला तत्व खिसक गया, बुनियाद गिर गई।*
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और यदि कर्ता समाप्त हो गया तो जीवन की समस्त बीमारियां विलीन हो जाती हैं।अन्यथा जीवन में बड़े जाल ही जाल हैं। धन की दौड़ भी कर्ता की दौड़ है, पद की दौड़ भी कर्ता की दौड़ है, प्रतिष्ठा की दौड़ भी कर्ता की दौड़ है; मनुष्य दुनिया को कुछ करके दिखाना चाहता है। कि नाम रह जाये। आखिर नाम रहने में प्रयोजन क्या है? किसी के नाम में दूसरे को उत्सुकता क्यों होगी? कोई चला ही गया तो दूसरा उसकी फिक्र क्यों लेगा? नाम बच भी गया तो सार क्या है? लेकिन मनुष्य को बचपन से ही ये रोग सिखाये जाते हैं। कि कुछ करके जाना है। लोग तो ऐसा भी सोच लेते हैं कि बदनाम हुए तो क्या हुआ, नाम तो रह जाएगा।
*कैसे-२ पागलपन में मनुष्य पड़ा हुआ है।*

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